वन नेशन-वन इलेक्शन पर तेज हुई बहस, 2029 में साथ चुनाव की संभावना पर सलमान खुर्शीद ने क्या कहा?
नई दिल्ली: देश में ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ यानी लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। एक तरफ सरकार इस व्यवस्था को लागू करने की दिशा में विधायी प्रक्रिया आगे बढ़ा रही है, वहीं दूसरी ओर विपक्षी दल इसके संवैधानिक पहलुओं और संभावित प्रभावों पर सवाल उठा रहे हैं। इसी बीच कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद ने भी इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया दी है।
‘एक देश हो, हम सब इसके लिए तैयार हैं
सलमान खुर्शीद ने कहा कि देश को एकजुट रखने और एक देश के रूप में आगे बढ़ने के विचार से किसी को आपत्ति नहीं है। उनके मुताबिक, चुनाव एक साथ कराना अलग तरह का संवैधानिक और तकनीकी विषय है, जिस पर फिलहाल चर्चा चल रही है।
उन्होंने कहा कि मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था में ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ को लागू करने को लेकर कई सवाल हैं। कांग्रेस नेता का मानना है कि अगर मौजूदा व्यवस्था को बदलकर इसे लागू किया जाता है, तो संविधान के बुनियादी ढांचे से जुड़े सवाल भी सामने आ सकते हैं।
कांग्रेस नेता ने बताया ‘एक सपना’
खुर्शीद ने ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ को फिलहाल एक सपना बताते हुए कहा कि आज की संवैधानिक व्यवस्था सीधे तौर पर एक साथ चुनाव कराने की अनुमति नहीं देती। उन्होंने संविधान में बदलाव की कोशिशों के संभावित परिणामों पर भी चिंता जताई।
उनका कहना है कि देश में एकता और साझा सोच जरूरी है, लेकिन चुनाव व्यवस्था में बदलाव के लिए संवैधानिक प्रावधानों और लोकतांत्रिक व्यवस्था को ध्यान में रखना होगा।
2029 में साथ चुनाव पर भी चर्चा
इस बीच संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के अध्यक्ष पीपी चौधरी ने सोमवार को कहा कि यदि संविधान में आवश्यक संशोधन हो जाते हैं और राज्य सरकारें इसके लिए तैयार होती हैं, तो 2029 में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराना संभव हो सकता है।
इस बयान के बाद ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ को लेकर 2029 का संभावित चुनाव चक्र चर्चा के केंद्र में आ गया है।
क्या है वन नेशन, वन इलेक्शन?
‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ का मतलब देश में लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने की व्यवस्था से है। वर्तमान में लोकसभा और अलग-अलग राज्यों के विधानसभा चुनाव अलग-अलग समय पर होते हैं।
समर्थकों का तर्क है कि एक साथ चुनाव कराने से बार-बार होने वाले चुनावों का खर्च और प्रशासनिक संसाधनों का इस्तेमाल कम हो सकता है। वहीं विरोध करने वाले दलों का कहना है कि इससे राज्यों के मुद्दों और क्षेत्रीय राजनीतिक प्राथमिकताओं पर राष्ट्रीय मुद्दों का प्रभाव बढ़ सकता है।
आगे क्या होगा?
अब इस प्रस्ताव पर संसद में विधायी प्रक्रिया, संवैधानिक संशोधनों और राज्यों की सहमति जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण होंगे। ऐसे में 2029 में एक साथ चुनाव की संभावना कितनी आगे बढ़ती है, यह आने वाले समय में होने वाली राजनीतिक और संवैधानिक प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।