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SIR Draft Voter List: दिल्ली-महाराष्ट्र में करोड़ों नाम ड्राफ्ट लिस्ट से बाहर, क्या बदल जाएगा चुनावी गणित? जानें पूरा मामला
 

 


नई दिल्ली: चुनाव आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR के तीसरे चरण के ड्राफ्ट आंकड़ों ने देश की चुनावी राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। अब तक 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में करीब 13.37 करोड़ मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट सूची में शामिल नहीं हो पाए हैं। हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि ड्राफ्ट सूची से नाम बाहर होना अंतिम रूप से मतदान के अधिकार से वंचित होना नहीं है।

सोमवार को दिल्ली और महाराष्ट्र की ड्राफ्ट मतदाता सूचियां सामने आने के बाद बड़े पैमाने पर हुए विलोपन का असर और स्पष्ट हुआ है। दोनों राज्यों को मिलाकर 2.54 करोड़ से ज्यादा नाम ड्राफ्ट सूची से बाहर हैं। ऐसे में अब सबसे महत्वपूर्ण चरण दावे और आपत्तियां दर्ज कराने का है।

महाराष्ट्र में 2 करोड़ से ज्यादा नाम ड्राफ्ट में नहीं

महाराष्ट्र में SIR से पहले करीब 9.78 करोड़ मतदाता पंजीकृत थे। ड्राफ्ट रोल में यह संख्या घटकर लगभग 7.71 करोड़ रह गई है। यानी करीब 2.06 करोड़ नाम फिलहाल ड्राफ्ट सूची में शामिल नहीं हैं।

राज्य के बड़े शहरी और औद्योगिक इलाकों में इसका असर खास तौर पर दिखाई दे रहा है।

महाराष्ट्र के प्रमुख जिले जहां सबसे ज्यादा नाम बाहर
पुणे: 28.66 लाख
ठाणे: 28.59 लाख
मुंबई उपनगर: 26.58 लाख
नागपुर: 14.43 लाख
नासिक: 10.27 लाख
मुंबई शहर: 9.50 लाख

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पुणे, ठाणे और मुंबई उपनगर को मिलाकर करीब 83.83 लाख नाम ड्राफ्ट सूची से बाहर हैं। यह महाराष्ट्र में हुए कुल विलोपन का लगभग 40 फीसदी से ज्यादा हिस्सा है।

प्रवासी और किराएदार आबादी पर सबसे बड़ा सवाल

महाराष्ट्र के महानगरीय इलाकों में बड़ी संख्या में लोग नौकरी और कारोबार के लिए दूसरे राज्यों या जिलों से आकर रहते हैं। खासकर मुंबई और पुणे जैसे शहरों में किराए के मकानों में रहने वाली आबादी का बड़ा हिस्सा लगातार अपना पता बदलता रहता है।

ऐसे में पता बदलने, दस्तावेजों के सत्यापन, एन्यूमरेशन फॉर्म जमा नहीं होने या अन्य प्रशासनिक कारणों की वजह से कुछ योग्य मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट सूची में शामिल नहीं हो पाए होने की आशंका जताई जा रही है।

अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि दावे और आपत्तियों की प्रक्रिया के दौरान इनमें से कितने नाम दोबारा मतदाता सूची में शामिल होते हैं।

दिल्ली में हर तीन में से करीब एक नाम ड्राफ्ट से बाहर

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में भी SIR के आंकड़े काफी बड़े हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, दिल्ली में पहले करीब 1.45 करोड़ मतदाता पंजीकृत थे। ड्राफ्ट सूची में यह संख्या घटकर करीब 97.53 लाख रह गई है।

यानी करीब 47.7 लाख नाम फिलहाल ड्राफ्ट रोल में शामिल नहीं हैं। प्रतिशत के लिहाज से यह करीब 32.8 फीसदी बैठता है।

दिल्ली जैसे महानगरीय क्षेत्र में यह आंकड़ा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां बड़ी संख्या में लोग काम और रोजगार के लिए दूसरे राज्यों से आते हैं और कई लोग किराए के मकानों में रहते हैं।

दिल्ली में एन्यूमरेशन फॉर्म के डिजिटाइजेशन में भी अंतर

ड्राफ्ट प्रक्रिया के दौरान अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों में एन्यूमरेशन फॉर्म के डिजिटाइजेशन की गति एक जैसी नहीं रही। उपलब्ध आंकड़ों में रोहिणी में करीब 83.4 फीसदी डिजिटाइजेशन बताया गया है, जबकि तुगलकाबाद में यह करीब 52.1 फीसदी रहा।

इस अंतर को लेकर भी प्रशासनिक स्तर पर सवाल उठ रहे हैं कि क्या तकनीकी प्रक्रिया और दस्तावेजों की उपलब्धता का असर ड्राफ्ट सूची पर पड़ा है।

दिल्ली में नाम बाहर होने के कारणों में अनुपस्थिति, मृत्यु और डुप्लीकेट प्रविष्टियां शामिल हैं। वहीं 'अन्य' श्रेणी में रखे गए मामलों की संख्या को लेकर भी ज्यादा स्पष्टता की मांग की जा रही है।

सबसे जरूरी बात- ड्राफ्ट लिस्ट अंतिम नहीं है

SIR के आंकड़ों को लेकर सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ड्राफ्ट मतदाता सूची अंतिम सूची नहीं होती।

अगर किसी योग्य मतदाता का नाम ड्राफ्ट सूची में नहीं है, तो वह निर्धारित प्रक्रिया के तहत दावा दाखिल करके अपना नाम शामिल कराने की कोशिश कर सकता है। इसलिए ड्राफ्ट में नाम नहीं होने का मतलब यह नहीं है कि संबंधित व्यक्ति हमेशा के लिए मतदान के अधिकार से बाहर हो गया।

30 सितंबर तक दावे और आपत्तियां

दिल्ली और महाराष्ट्र समेत संबंधित राज्यों में मतदाताओं को 31 अगस्त से 30 सितंबर 2026 तक दावे और आपत्तियां दर्ज कराने का मौका दिया गया है।

जरूरत के मुताबिक अलग-अलग फॉर्म का इस्तेमाल किया जा सकता है:

Form 6: नया नाम जोड़ने या पात्र मतदाता का नाम शामिल कराने के लिए।
Form 7: किसी प्रविष्टि पर आपत्ति या गलत/डुप्लीकेट नाम हटाने के लिए।
Form 8: नाम, पता, उम्र, लिंग आदि में सुधार के लिए।

इसके बाद संबंधित अधिकारियों द्वारा दावों और आपत्तियों की जांच की जाएगी। उपलब्ध कार्यक्रम के अनुसार 29 अक्टूबर तक जांच प्रक्रिया पूरी की जानी है और 4 नवंबर 2026 को अंतिम संशोधित मतदाता सूची प्रकाशित की जानी है।

राजनीतिक दलों के लिए भी बड़ी चुनौती

SIR का असर केवल प्रशासनिक स्तर तक सीमित नहीं रहने वाला है। इतनी बड़ी संख्या में नाम ड्राफ्ट सूची से बाहर होने के बाद राजनीतिक दलों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो गई है।

चुनाव आयोग की ओर से मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों को हटे हुए नामों और उनके कारणों से जुड़ी जानकारी उपलब्ध कराई गई है। अब दलों के बूथ लेवल एजेंट यानी BLAs की जिम्मेदारी होगी कि वे योग्य मतदाताओं की पहचान करने और जरूरत पड़ने पर उनके दावे दाखिल कराने में मदद करें।

क्या बदल सकता है चुनावी गणित?

दिल्ली और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में करोड़ों नामों का ड्राफ्ट सूची से बाहर होना निश्चित तौर पर राजनीतिक रूप से बड़ा मुद्दा है। खासकर महानगरों में जहां प्रवासी और किराएदार आबादी बड़ी संख्या में रहती है, वहां अंतिम सूची में कितने नाम वापस जुड़ते हैं, इस पर सभी की नजर रहेगी।

हालांकि, केवल ड्राफ्ट आंकड़ों के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि किसी खास राजनीतिक दल को इसका फायदा या नुकसान होगा। इसके लिए बूथ और विधानसभा क्षेत्र स्तर पर यह देखना जरूरी होगा कि बाहर हुए नाम किन कारणों से हटे और दावे-आपत्तियों के बाद कितने नाम वापस जोड़े गए।

अगले कुछ सप्ताह SIR की पूरी प्रक्रिया के लिए बेहद अहम हैं। 30 सितंबर तक चलने वाला दावा-आपत्ति चरण यह तय करेगा कि ड्राफ्ट सूची में बाहर हुए कितने वास्तविक और पात्र मतदाता अंतिम मतदाता सूची में वापस जगह बना पाते हैं।