अखिलेश यादव के खिलाफ पोस्टर वार तेज, लखनऊ समेत 15 जिलों में लगे विवादित पोस्टर; माफिया, परिवारवाद और PCS भर्ती को लेकर साधा निशाना
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक माहौल गरमाने लगा है। समाजवादी पार्टी (सपा) प्रमुख अखिलेश यादव के खिलाफ पोस्टर लगाए जाने के बाद राज्य की सियासत में नई चर्चा शुरू हो गई है। गुरुवार को अखिलेश यादव ने आजम खान से मुलाकात की थी। इसके अगले दिन शुक्रवार सुबह प्रदेश के कई शहरों में प्रमुख चौराहों पर अखिलेश यादव को निशाना बनाते पोस्टर दिखाई दिए।
इन पोस्टरों में तुकबंदी वाले नारों और तस्वीरों के जरिए सपा पर निशाना साधा गया है। पोस्टरों में माफिया से जुड़े रहे पूर्व नेताओं, परिवारवाद, इफ्तार पार्टी और 2013 की यूपी-पीसीएस भर्ती परीक्षा जैसे मुद्दों का जिक्र किया गया है। पोस्टरों को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चाएं तेज हो गई हैं।
लखनऊ में अखिलेश यादव के खिलाफ लगा बड़ा पोस्टर
लखनऊ में नेशनल पीजी कॉलेज क्रॉसिंग के पास अखिलेश यादव के खिलाफ एक बड़ा पोस्टर लगाया गया। इसमें अखिलेश यादव की गोल टोपी वाली तस्वीर के साथ माफिया के तौर पर चर्चित रहे अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी की तस्वीरें भी दिखाई गई हैं।पोस्टर पर तंज कसते हुए लिखा गया है, 'चाय, समोसा, रसमलाई, सारे माफिया अपने भाई'। एक अन्य नारे में लिखा है, 'सपाइयों का क्या भरोसा, चाय, समोसा, रस मलाई, सारे माफिया अपने भाई।'इन नारों के जरिए पोस्टर लगाने वालों ने समाजवादी पार्टी और उसके नेतृत्व पर निशाना साधने की कोशिश की है। हालांकि, इन पोस्टरों को किसने लगवाया है, इसकी जानकारी सामने आए विवरण में स्पष्ट नहीं है।
लखनऊ ही नहीं, 15 जिलों में दिखाई दिए पोस्टर
अखिलेश यादव के खिलाफ पोस्टर केवल राजधानी लखनऊ तक सीमित नहीं रहे। खबर के मुताबिक, प्रदेश के करीब 15 जिलों में ऐसे पोस्टर लगाए गए हैं।इनमें बलिया, मऊ, गाजीपुर, आजमगढ़, वाराणसी, बस्ती, हरदोई और सीतापुर समेत कई जिलों के नाम शामिल हैं। पोस्टरों में अखिलेश यादव के साथ अतीक अहमद, मुख्तार अंसारी और आजम खान की तस्वीरों का इस्तेमाल किया गया है।पोस्टरों के जरिए सपा के राजनीतिक इतिहास और उसके शासनकाल से जुड़े मुद्दों को उठाते हुए पार्टी की आलोचना की गई है।
2013 की PCS भर्ती परीक्षा का भी किया गया जिक्र
पोस्टर वार में 2013 की उत्तर प्रदेश पीसीएस भर्ती परीक्षा का मुद्दा भी शामिल किया गया है। पोस्टर में दावा किया गया है कि कुल 86 पदों में से 56 भर्तियां एक विशेष जाति के लोगों की हुई थीं।इसी दावे को आधार बनाकर सपा पर निशाना साधते हुए लिखा गया है, 'रसगुल्ला और रसमलाई, एक जाति की सत्ता आई'।यह दावा पोस्टर में किया गया है। इसकी स्वतंत्र पुष्टि के बिना इसे प्रमाणित तथ्य नहीं माना जाना चाहिए। भर्ती प्रक्रिया को लेकर लगाए गए आरोपों की वास्तविकता समझने के लिए संबंधित आधिकारिक रिकॉर्ड और उपलब्ध जांच रिपोर्टों को देखना जरूरी है।
परिवारवाद के आरोपों को लेकर भी हमला
पोस्टरों में समाजवादी पार्टी पर परिवारवाद का आरोप लगाते हुए भी निशाना साधा गया है। एक पोस्टर पर लिखा है, 'दाल, चावल और अचार, पार्टी मतलब एक परिवार'।इस नारे के जरिए पोस्टर लगाने वालों ने सपा के नेतृत्व और पार्टी में परिवार की भूमिका पर सवाल उठाने की कोशिश की है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में परिवारवाद का मुद्दा लंबे समय से विभिन्न दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का हिस्सा रहा है।
इफ्तार पार्टी और मुजफ्फरनगर दंगों का भी जिक्र
कुछ पोस्टरों में अखिलेश यादव की इफ्तार पार्टी और सपा सरकार के दौरान हुए मुजफ्फरनगर दंगों का भी उल्लेख किया गया है। इनमें लिखा है, 'दंगा, इफ्तार और बिरयानी, सपा राज की असल कहानी'।इस नारे के जरिए सपा के शासनकाल को लेकर राजनीतिक तंज कसा गया है। पोस्टरों में धार्मिक आयोजनों और दंगों को एक साथ जोड़कर पार्टी की आलोचना की गई है।
विधानसभा चुनाव से पहले तेज हुई पोस्टरबाजी
उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक दलों और उनके विरोधियों के बीच बयानबाजी तेज होने की संभावना है। ऐसे में अलग-अलग शहरों में लगाए गए ये पोस्टर राजनीतिक चर्चा का विषय बन गए हैं।पोस्टरों में इस्तेमाल किए गए नारों और तस्वीरों से साफ है कि निशाना सीधे अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी की राजनीतिक छवि पर साधा गया है। हालांकि, पोस्टरों के पीछे किस संगठन या व्यक्ति का हाथ है, इसकी आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है।अब देखना होगा कि समाजवादी पार्टी इन पोस्टरों पर क्या प्रतिक्रिया देती है और आने वाले दिनों में प्रदेश की राजनीति में यह पोस्टर वार कितना तूल पकड़ता है।