मोदी-जिनपिंग मीट पर सियासत: गलवान, लद्दाख और अरुणाचल के मुद्दों पर Congress ने पीएम से मांगे जवाब
भारत की मेजबानी में हुए BRICS शिखर सम्मेलन के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हुई द्विपक्षीय बातचीत अब राजनीतिक चर्चा का विषय बन गई है। कांग्रेस सांसद पवन खेड़ा ने इस मुलाकात को लेकर केंद्र सरकार से कई अहम सवाल पूछे हैं। उन्होंने खास तौर पर लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश, गलवान के शहीदों और चीन की भूमिका से जुड़े मुद्दों पर सरकार से जवाब मांगा है।
पवन खेड़ा ने सवाल उठाया कि प्रधानमंत्री मोदी और शी जिनपिंग की बातचीत के दौरान क्या भारत ने चीन के सामने लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश से जुड़े अपने मुद्दों को मजबूती से रखा? सबसे बड़ा सवाल उन्होंने यह उठाया कि क्या लद्दाख में मई-जून 2020 से पहले वाली स्थिति पूरी तरह बहाल हो चुकी है?
क्या लद्दाख में 2020 वाली स्थिति वापस आई?
कांग्रेस नेता पवन खेड़ा का कहना है कि केवल कूटनीतिक बैठकों और बयानों से देश के महत्वपूर्ण मुद्दों का समाधान नहीं हो सकता। उन्होंने गलवान घाटी में शहीद हुए 20 भारतीय जवानों को याद करते हुए कहा कि उनकी शहादत को देश कभी नहीं भूल सकता।
खेड़ा ने सरकार से यह भी पूछा कि अगर चीन के साथ रिश्तों में सुधार की बात हो रही है, तो क्या वास्तविक जमीन पर भी स्थिति पहले जैसी हुई है? क्या सीमा पर 2020 से पहले वाली स्थिति पूरी तरह वापस आई है? उनके मुताबिक, इन सवालों का स्पष्ट जवाब देश के सामने आना चाहिए।
ऑपरेशन सिंदूर में चीन की भूमिका पर भी सवाल
पवन खेड़ा ने 'ऑपरेशन सिंदूर' का जिक्र करते हुए चीन की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि पाकिस्तान को कथित तौर पर चीन से मिली मदद के मुद्दे पर क्या भारत ने चीन के साथ हुई द्विपक्षीय बातचीत में कोई जवाब मांगा?
कांग्रेस नेता का कहना है कि अगर भारत और चीन के बीच संबंधों को लेकर नई शुरुआत की जा रही है, तो सीमा विवाद और सुरक्षा से जुड़े सवालों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
BRICS घोषणापत्र की भाषा पर भी आपत्ति
पवन खेड़ा ने BRICS सम्मेलन के बाद जारी नई दिल्ली घोषणापत्र में इस्तेमाल की गई भाषा पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि 22 अप्रैल 2025 को हुए पहलगाम आतंकी हमले की निंदा जरूर की गई, लेकिन घोषणापत्र में सीधे तौर पर पाकिस्तान का नाम नहीं लिया गया।
उनका सवाल है कि जब भारत आतंकवाद के खिलाफ अपनी स्थिति लगातार स्पष्ट करता रहा है, तो अंतरराष्ट्रीय मंच पर इस मुद्दे पर भाषा इतनी स्पष्ट क्यों नहीं रखी गई?
इसी तरह उन्होंने पश्चिम एशिया की स्थिति को लेकर भी घोषणापत्र में इस्तेमाल किए गए शब्दों पर सवाल खड़े किए। उनका कहना है कि भारत को अपने राष्ट्रीय हितों से जुड़े मुद्दों पर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी बात और ज्यादा स्पष्ट तरीके से रखनी चाहिए।
चाबहार पोर्ट और व्यापार पर भी सरकार से सवाल
कांग्रेस नेता ने ईरान के चाबहार बंदरगाह का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने पूछा कि चाबहार को लेकर लंबे समय से चल रही चर्चाओं और भारत की रणनीतिक योजनाओं में अब क्या प्रगति हुई है।
इसके साथ ही उन्होंने BRICS के आर्थिक ढांचे और चीन के साथ भारत के व्यापारिक संबंधों पर भी सवाल उठाया। उनका तर्क है कि BRICS में चीन की आर्थिक भूमिका बेहद बड़ी है और ऐसे में भारत को यह देखना होगा कि इस संगठन से देश को वास्तविक आर्थिक और रणनीतिक फायदा कितना मिल रहा है।
दूसरी तरफ, नई दिल्ली घोषणापत्र को बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि बताया गया
हालांकि, दूसरी तरफ केंद्र सरकार और BRICS से जुड़े पक्षों की नजर में भारत की अध्यक्षता में हुआ 18वां BRICS सम्मेलन एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक पहल माना जा रहा है। सम्मेलन में सदस्य देशों ने सर्वसम्मति से 'नई दिल्ली घोषणापत्र' को स्वीकार किया।
घोषणापत्र में आतंकवाद, टेरर फंडिंग, सीमा पार आतंकवाद, साइबर अपराध और आतंकियों के सुरक्षित ठिकानों जैसे मुद्दों के खिलाफ सख्त रुख अपनाने की बात कही गई है। पहलगाम आतंकी हमले की भी निंदा की गई है।
यानी BRICS सम्मेलन के बाद एक तरफ सरकार इसे भारत की कूटनीतिक सफलता के तौर पर देख रही है, तो दूसरी तरफ विपक्ष सरकार से यह पूछ रहा है कि चीन के साथ बातचीत में भारत के सबसे संवेदनशील मुद्दों पर वास्तव में क्या हासिल हुआ।
अब राजनीतिक बहस का केंद्र यही है कि मोदी-शी जिनपिंग की बातचीत से भारत-चीन संबंधों में सिर्फ बयानबाजी का बदलाव आया है या फिर सीमा, सुरक्षा और व्यापार से जुड़े जमीनी मुद्दों पर भी कोई ठोस प्रगति हुई है।