भारतीयों की सेहत से खिलवाड़? विदेश में प्रीमियम और भारत में मिलावटी... समझें ब्रांड्स का 'डबल स्टैंडर्ड'
एक ही कंपनी और एक ही ब्रांड का नाम देखकर अक्सर लगता है कि अलग-अलग देशों में बिकने वाला प्रोडक्ट भी बिल्कुल एक जैसा होगा. लेकिन ऐसा जरूरी नहीं है. कई मामलों में भारत और दूसरे देशों में एक ही ब्रांड के प्रोडक्ट की सामग्री, तेल, चीनी और लेबलिंग में अंतर देखने को मिलता है.
सबसे बड़ा फर्क पैकेजिंग पर दी जाने वाली जानकारी का भी है. कुछ देशों में ज्यादा चीनी, नमक या फैट वाले प्रोडक्ट पर पैकेट के सामने ही स्पष्ट चेतावनी दी जाती है, जबकि भारत में ऐसी जानकारी आमतौर पर पैकेट के पीछे छोटे अक्षरों में दी जाती है.
फैंटा से समझिए पूरा मामला
लंदन में बिकने वाली फैंटा के एक कैन में करीब 63 कैलोरी बताई जाती है. वहीं भारत में मिलने वाले इसी ब्रांड के कुछ वर्जन में चीनी की मात्रा काफी ज्यादा बताई गई है. इसमें आर्टिफिशियल कलर का इस्तेमाल भी किया जाता है.
यूरोप के कुछ बाजारों में ऐसे रंगों वाले उत्पादों पर पैकेट के सामने स्पष्ट चेतावनी दी जाती है. वहीं भारत में संबंधित जानकारी पैकेट के पीछे लिखी होती है, जिसे देखने के लिए ग्राहक को लेबल ध्यान से पढ़ना पड़ता है.
कुछ कंपनियां यूरोप के कई बाजारों में अपनी ड्रिंक्स पर ट्रैफिक-लाइट जैसे लेबल का इस्तेमाल करती हैं, जिसमें पोषण संबंधी जानकारी को आसानी से समझा जा सकता है.
किटकैट में कोको का अंतर
चॉकलेट के मामले में भी अलग-अलग देशों में सामग्री का अंतर देखने को मिलता है. भारत में बिकने वाले कुछ किटकैट वर्जन में कोको सॉलिड की मात्रा करीब 4.5 फीसदी बताई गई है. वहीं ऑस्ट्रेलिया में बिकने वाले किटकैट मिल्क चॉकलेट में कोको की मात्रा इससे काफी ज्यादा बताई जाती है.
भारतीय वर्जन में बाकी हिस्से में चीनी, मिल्क पाउडर और वेजिटेबल फैट जैसी सामग्री शामिल होती है. हालांकि अलग-अलग वेरिएंट में सामग्री और मात्रा अलग हो सकती है.
मैगी के लेबल को लेकर भी सवाल
मैगी को लेकर भी भारत और ब्रिटेन के प्रोडक्ट की तुलना की जाती रही है. भारत में बिकने वाले कई मैगी वेरिएंट में पाम ऑयल का इस्तेमाल होता है, जबकि ब्रिटेन में उपलब्ध कुछ वेरिएंट में सनफ्लावर ऑयल इस्तेमाल किया जाता है.
एक और बड़ा अंतर लेबलिंग का है. ब्रिटेन में बिकने वाले कुछ पैकेटों पर फ्रंट-ऑफ-पैक ट्रैफिक-लाइट लेबल के जरिए नमक, चीनी और फैट की मात्रा को आसानी से समझाया जाता है. भारत में इसी तरह की फ्रंट चेतावनी व्यवस्था अभी लागू नहीं है.
बेबी फूड को लेकर भी उठे सवाल
नेस्ले ने 2024 में भारत में बिना अतिरिक्त चीनी वाले सेरेलैक वेरिएंट की शुरुआत की थी. इससे पहले भारत में मिलने वाले सेरेलैक की अतिरिक्त चीनी को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे थे.
यह मुद्दा तब ज्यादा चर्चा में आया जब अलग-अलग देशों में बिकने वाले बेबी फूड की सामग्री की तुलना सोशल मीडिया और कई रिपोर्टों में की गई.
कंपनियां अलग रेसिपी को लेकर क्या कहती हैं?
कंपनियों का कहना है कि अलग-अलग देशों में लोगों की पसंद, स्वाद, स्थानीय नियम और कीमत को ध्यान में रखते हुए प्रोडक्ट की रेसिपी में बदलाव किया जाता है.
इंडस्ट्री से जुड़े लोगों का यह भी तर्क रहा है कि कीमत कम रखने के लिए कंपनियों को स्थानीय बाजार में उपलब्ध और अपेक्षाकृत सस्ते कच्चे माल का इस्तेमाल करना पड़ सकता है.
हालांकि सवाल यह है कि अगर किसी प्रोडक्ट में चीनी, नमक या फैट की मात्रा ज्यादा है, तो इसकी जानकारी ग्राहक को आसानी से क्यों न दी जाए.
भारत में फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग पर चल रही बहस
कई देशों में पैकेट के सामने ही रंगों या चेतावनी चिन्हों के जरिए यह बताया जाता है कि किसी प्रोडक्ट में चीनी, नमक या फैट की मात्रा कितनी है.
भारत में भी कई वर्षों से फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग को लेकर बहस चल रही है. भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण यानी FSSAI की ओर से पोषण संबंधी जानकारी को पैकेट के सामने ज्यादा स्पष्ट तरीके से दिखाने के विकल्पों पर चर्चा हुई है.
हालांकि इस व्यवस्था को लेकर खाद्य उद्योग और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के बीच अलग-अलग राय रही है.
सुप्रीम कोर्ट में भी पहुंचा मामला
फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है. स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की ओर से दायर याचिका में पैकेट के सामने स्पष्ट चेतावनी देने की मांग की गई है.
अदालत ने भी इस मुद्दे पर खाद्य नियामक से गंभीरता से विचार करने को कहा है. बहस का मुख्य सवाल यही है कि ग्राहकों को किसी पैकेज्ड फूड में मौजूद ज्यादा चीनी, नमक या फैट की जानकारी खरीदारी के समय आसानी से मिलनी चाहिए या नहीं.
पैकेज्ड फूड का बाजार कितना बड़ा है?
भारत में पैकेज्ड फूड और बेवरेज का बाजार तेजी से बढ़ रहा है. इसी के साथ ज्यादा चीनी, नमक और फैट वाले खाद्य पदार्थों के सेवन को लेकर स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं भी बढ़ी हैं.
ऐसे में फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग को लेकर बहस सिर्फ कंपनियों और सरकार तक सीमित नहीं है. इसका सीधा संबंध ग्राहकों के स्वास्थ्य और उन्हें सही जानकारी देकर बेहतर विकल्प चुनने की क्षमता से भी है.
ग्राहक खुद कैसे रखें अपनी सेहत का ध्यान?
जब तक पैकेट के सामने स्पष्ट चेतावनी की व्यवस्था पूरी तरह लागू नहीं होती, तब तक खरीदारी करते समय लेबल पढ़ना सबसे जरूरी है.
इन तीन चीजों पर खास ध्यान दें:
- 100 ग्राम प्रोडक्ट में कितनी चीनी है
- नमक की मात्रा कितनी है
- किस तरह के तेल या फैट का इस्तेमाल किया गया है
इसके अलावा सामग्री की सूची भी जरूर पढ़ें. आमतौर पर सूची में सामग्री जिस क्रम में लिखी होती है, उसमें शुरुआती सामग्री की मात्रा अपेक्षाकृत ज्यादा होती है.
इसलिए सिर्फ ब्रांड और पैकेट देखकर प्रोडक्ट को हेल्दी मानने के बजाय लेबल पढ़कर ही फैसला लेना ज्यादा बेहतर है.