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नॉर्वे प्रेस मीट विवाद: एक्सक्लुसीव फुटेज में देखें राहुल गांधी का पीएम मोदी पर हमला, प्रेस कॉन्फ्रेंस न लेने पर उठाए सवाल

 

नॉर्वे दौरे के दौरान आयोजित संयुक्त प्रेस मीट को लेकर भारत की राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए तीखी प्रतिक्रिया दी है।

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राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए लिखा कि जब दुनिया एक “कंप्रोमाइज प्रधानमंत्री” को कुछ सवालों से घबराकर भागते हुए देखती है, तो इससे भारत की छवि पर नकारात्मक असर पड़ता है। उन्होंने आगे कहा कि यदि छिपाने के लिए कुछ नहीं है, तो सवालों से डरने की भी कोई आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।

कांग्रेस नेता ने अपनी पोस्ट में नॉर्वे की एक पत्रकार हेली लिंग की पोस्ट को भी साझा किया, जिसमें इस प्रेस मीट से जुड़े अनुभव का उल्लेख किया गया था। इस पूरे मामले ने भारतीय राजनीति में नई बहस को जन्म दे दिया है, जहां विपक्ष सरकार पर पारदर्शिता को लेकर सवाल उठा रहा है।

यह विवाद उस समय सामने आया है जब प्रधानमंत्री मोदी ने सोमवार को नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनेस गार स्टोरे के साथ संयुक्त प्रेस मीट की थी। यह बैठक दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने के उद्देश्य से आयोजित की गई थी। हालांकि, रिपोर्ट्स के अनुसार इस प्रेस मीट में मीडिया के सवालों का औपचारिक सत्र नहीं रखा गया, जिसको लेकर अब राजनीतिक बहस तेज हो गई है।

नॉर्वे की राजधानी में आयोजित इस कार्यक्रम में दोनों नेताओं ने आर्थिक सहयोग, ऊर्जा साझेदारी और वैश्विक मुद्दों पर चर्चा की। लेकिन प्रेस इंटरैक्शन के अभाव को लेकर अब विपक्ष सरकार की विदेश नीति और संवाद शैली पर सवाल खड़े कर रहा है।

राहुल गांधी की इस टिप्पणी के बाद राजनीतिक हलकों में प्रतिक्रियाएं भी सामने आने लगी हैं। कांग्रेस समर्थकों का कहना है कि लोकतंत्र में प्रेस के सवालों का सामना करना सरकार की जिम्मेदारी है, जबकि सत्ताधारी दल के समर्थक इसे एक सामान्य कूटनीतिक कार्यक्रम बता रहे हैं, जिसमें हर बार विस्तृत मीडिया प्रश्नोत्तर सत्र आवश्यक नहीं होता।

विशेषज्ञों का मानना है कि विदेश यात्राओं के दौरान संयुक्त प्रेस मीट का स्वरूप अलग-अलग हो सकता है और यह पूरी तरह मेजबान देश और द्विपक्षीय सहमति पर निर्भर करता है। ऐसे में इस विवाद को राजनीतिक दृष्टिकोण से अधिक देखा जा रहा है।

फिलहाल इस मामले ने देश की राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे दिया है, जहां पारदर्शिता, मीडिया से संवाद और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नेताओं की भूमिका को लेकर अलग-अलग राय सामने आ रही हैं। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर और राजनीतिक बयानबाजी तेज होने की संभावना जताई जा रही है।