'छात्रों की गूंज' बनाम BJP का किला: क्या Gen Z के सहारे बदल पाएगा 2029 का समीकरण?
देश की राजनीति में इस वक्त युवाओं और Gen Z को लेकर नई बहस तेज हो गई है। 2026 में छात्र आंदोलनों, रोजगार, शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था जैसे मुद्दों ने राजनीति के केंद्र में युवाओं की भूमिका को फिर से सामने ला दिया है। इसी माहौल में कांग्रेस नेता राहुल गांधी का 'छात्रों की गूंज' अभियान चर्चा में है, जिसके जरिए छात्रों और युवाओं की समस्याओं को सीधे राजनीतिक मंच पर उठाने की कोशिश की जा रही है।
लेकिन दूसरी तरफ बीजेपी और उससे जुड़े छात्र संगठन भी युवाओं के बीच अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए सक्रिय हैं। इसका ताजा उदाहरण दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्रसंघ चुनाव 2026 में देखने को मिला, जहां ABVP ने चार में से तीन केंद्रीय पदों पर जीत दर्ज की। हालांकि, यह एक विश्वविद्यालय का चुनाव है और इसे पूरे देश के Gen Z मतदाताओं की राय का प्रतिनिधि मानना उचित नहीं होगा।
इस पूरी कहानी की शुरुआत सिर्फ चुनावी राजनीति से नहीं हुई। 2026 में छात्र और Gen Z से जुड़े आंदोलनों ने शिक्षा, परीक्षा व्यवस्था और रोजगार जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय बहस में ला दिया। इन आंदोलनों के बाद तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की घटना ने भी युवा राजनीति को लेकर चर्चा बढ़ाई।
अब बड़ा सवाल 2029 का है—क्या युवाओं के मुद्दे आने वाले लोकसभा चुनाव में बड़ा राजनीतिक फैक्टर बन सकते हैं?
एक C-Voter सर्वे के मुताबिक 58.7 प्रतिशत युवाओं ने कहा कि राजनीतिक दल Gen Z की चिंताओं को समझते नहीं हैं। सर्वे में रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य को सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में बताया गया। करीब 74.6 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा कि अगर पार्टियां युवा उम्मीदवार मैदान में उतारती हैं तो वे ऐसे उम्मीदवारों को वोट देने पर विचार करेंगे।
यानी युवा मतदाता सिर्फ नारों या सोशल मीडिया कैंपेन से प्रभावित होंगे, ऐसा मानना जल्दबाजी होगी। रोजगार, शिक्षा, महंगाई, स्वास्थ्य और परीक्षा व्यवस्था जैसे सीधे जीवन से जुड़े मुद्दे उनके लिए महत्वपूर्ण बताए गए हैं।
इसी वजह से बीजेपी ने भी युवाओं तक पहुंचने के अपने तरीके में बदलाव किया है। रिपोर्टों के मुताबिक पार्टी और सरकार की डिजिटल रणनीति में Instagram Reels, छोटे वीडियो और ज्यादा अनौपचारिक संवाद पर जोर बढ़ा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी Gen Z तक पहुंचने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल बढ़ाया है।
दूसरी तरफ राहुल गांधी लगातार छात्रों और युवाओं के बीच संवाद बढ़ा रहे हैं। 'छात्रों की गूंज' अभियान में छात्रों से उनके सपनों और उन सपनों के रास्ते में आने वाली परेशानियों के बारे में सीधे सुझाव मांगे गए। इंदौर में हुए कार्यक्रम में शिक्षा और युवाओं से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता दी गई।
हालांकि इस अभियान को लेकर राजनीतिक विवाद भी सामने आया है। इंदौर के कार्यक्रम के बाद बीजेपी ने आरोप लगाया कि मंच पर अपनी समस्याएं बताने वाले कुछ युवाओं का कांग्रेस या NSUI से संबंध रहा है। एक छात्र ने खुद NSUI से जुड़े होने की बात स्वीकार की। कांग्रेस की तरफ से इस मामले में राजनीतिक कार्यक्रम और युवाओं की भागीदारी को लेकर अलग दृष्टिकोण सामने आया है।
ऐसे में 2029 तक की तस्वीर कई चीजों पर निर्भर करेगी—युवाओं के बीच रोजगार और शिक्षा जैसे मुद्दों की प्राथमिकता कितनी बनी रहती है, राजनीतिक दल इन मुद्दों पर क्या नीतियां और उम्मीदवार सामने रखते हैं, और Gen Z की ऑनलाइन सक्रियता कितनी वास्तविक चुनावी भागीदारी में बदलती है।
2029 अभी दूर है, इसलिए आज के छात्र आंदोलनों या किसी एक विश्वविद्यालय चुनाव से यह तय नहीं किया जा सकता कि भविष्य में युवा मतदाता किस पार्टी के साथ जाएंगे। लेकिन इतना जरूर है कि 2026 की घटनाओं ने राजनीतिक दलों को यह संकेत दिया है कि Gen Z को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा।
अब देखना यही है कि आने वाले वर्षों में 'छात्रों की गूंज' सिर्फ आंदोलनों और सोशल मीडिया तक सीमित रहती है या रोजगार, शिक्षा और युवाओं की राजनीतिक भागीदारी के मुद्दे 2029 के चुनावी विमर्श का बड़ा हिस्सा बनते हैं।