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Delhi Police Body Camera: प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मियों की हर गतिविधि होगी रिकॉर्ड, जानें कैसे काम करता है यह डिवाइस

 

दिल्ली में विरोध-प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की कार्रवाई और प्रदर्शनकारियों के साथ व्यवहार को लेकर चर्चा के बीच बॉडी वॉर्न कैमरे सुर्खियों में हैं। राजधानी में सुरक्षा व्यवस्था संभाल रहे पुलिसकर्मियों की वर्दी पर लगाए गए ये छोटे कैमरे ड्यूटी के दौरान होने वाली घटनाओं को रिकॉर्ड करने में मदद करेंगे। देखने में ये डिवाइस वॉकी-टॉकी जैसे लग सकते हैं, लेकिन इनका मुख्य काम वीडियो और ऑडियो रिकॉर्ड करना है।

दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन स्थलों और भारतीय निर्वाचन आयोग के कार्यालय की ओर जाने वाली सड़कों पर तैनात जवानों को ये कैमरे दिए हैं। इनका उद्देश्य पुलिस की कार्रवाई और घटनाक्रम का रिकॉर्ड तैयार करना है। ऐसे में सवाल है कि बॉडी वॉर्न कैमरे कैसे काम करते हैं और भीड़ को नियंत्रित करने के दौरान इनकी क्या भूमिका हो सकती है?

क्या होते हैं बॉडी वॉर्न कैमरे?

बॉडी वॉर्न कैमरे छोटे आकार के रिकॉर्डिंग डिवाइस होते हैं, जिन्हें पुलिसकर्मी अपनी वर्दी पर छाती, कंधे या कॉलर के पास लगाते हैं। ये कैमरे वीडियो के साथ ऑडियो भी रिकॉर्ड कर सकते हैं। इससे ड्यूटी के दौरान हुई बातचीत, पुलिस की कार्रवाई और मौके पर मौजूद लोगों की गतिविधियों का रिकॉर्ड तैयार किया जा सकता है।

इन कैमरों का इस्तेमाल विशेष रूप से प्रदर्शन, भीड़ नियंत्रण और कानून-व्यवस्था से जुड़ी परिस्थितियों में उपयोगी हो सकता है। किसी घटना के बाद जब पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बयानों में अंतर होता है, तब रिकॉर्डिंग घटनाक्रम को समझने में मदद कर सकती है।

कैसे काम करते हैं दिल्ली पुलिस के बॉडी कैमरे?

बॉडी वॉर्न कैमरों को आमतौर पर पुलिसकर्मी जरूरत के अनुसार मैन्युअल तरीके से चालू या बंद कर सकते हैं। कुछ आधुनिक मॉडलों में ऐसी सुविधाएं भी होती हैं, जिनके जरिए किसी विशेष गतिविधि के दौरान कैमरा अपने आप चालू हो सकता है। हालांकि, यह सुविधा डिवाइस के मॉडल और उसमें मौजूद तकनीक पर निर्भर करती है।

इन कैमरों में बैटरी लगी होती है, जो कई घंटों तक रिकॉर्डिंग करने में सक्षम हो सकती है। रिकॉर्ड किए गए वीडियो और ऑडियो को सुरक्षित रखने के लिए कुछ डिवाइस में डेटा एन्क्रिप्शन जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है। इससे रिकॉर्डिंग तक अनधिकृत पहुंच को रोकने में मदद मिलती है।

हालांकि, कैमरे की रिकॉर्डिंग कितने समय तक सुरक्षित रखी जाएगी, उसे कौन देख सकेगा और जरूरत पड़ने पर उसे जांच के लिए कैसे उपलब्ध कराया जाएगा, यह संबंधित विभाग की नीतियों और तकनीकी व्यवस्था पर निर्भर करता है।

प्रदर्शन के दौरान क्या होगी इन कैमरों की भूमिका?

प्रदर्शन स्थलों पर बॉडी वॉर्न कैमरे कई तरह से उपयोगी हो सकते हैं। इनके जरिए पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई बातचीत तथा मौके पर हुई कार्रवाई का रिकॉर्ड तैयार किया जा सकता है। किसी विवाद या शिकायत की स्थिति में रिकॉर्डिंग की जांच से घटनाक्रम को समझने में मदद मिल सकती है।

इन कैमरों से पुलिस की जवाबदेही और कार्रवाई में पारदर्शिता बढ़ाने की संभावना भी रहती है। हालांकि, इसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि कैमरे कब चालू रखे जाते हैं, रिकॉर्डिंग कितनी स्पष्ट है और फुटेज की जांच किस प्रक्रिया के तहत होती है।

बॉडी कैमरों को अनिवार्य करने की मांग क्यों उठी?

प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की कार्रवाई की रिकॉर्डिंग सुनिश्चित करने के लिए दिल्ली हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई थी। इसमें भीड़ नियंत्रण, प्रदर्शन प्रबंधन और भीड़ को हटाने के लिए तैनात दिल्ली पुलिस तथा रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) के जवानों के लिए बॉडी वॉर्न कैमरे अनिवार्य करने की मांग की गई थी।

याचिका में यह भी मांग रखी गई कि पुलिसकर्मियों के ड्यूटी पर आने से लेकर ड्यूटी समाप्त होने तक कैमरे चालू रखने के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) बनाई जाए। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि कार्रवाई के दौरान होने वाली घटनाओं का रिकॉर्ड उपलब्ध रहे।

हालांकि, दिल्ली हाई कोर्ट ने बॉडी वॉर्न कैमरों को अनिवार्य बनाने का निर्देश देने से इनकार कर दिया और इस विषय पर निर्णय सरकार पर छोड़ दिया।

रिकॉर्डिंग से बढ़ सकती है पारदर्शिता

बॉडी वॉर्न कैमरे पुलिस की कार्यप्रणाली का रिकॉर्ड रखने का एक तकनीकी माध्यम हैं। इनसे घटनाओं की जांच, शिकायतों के सत्यापन और पुलिस तथा प्रदर्शनकारियों के बीच हुए विवादों को समझने में मदद मिल सकती है। लेकिन इनके प्रभावी इस्तेमाल के लिए कैमरों को चालू रखने, रिकॉर्डिंग सुरक्षित रखने और फुटेज तक पहुंच के स्पष्ट नियम होना भी जरूरी है।