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China Nuclear Test: क्या लोप नूर की नमक की गुफाओं में परमाणु परीक्षण कर रहा है चीन? समझें अमेरिका के दावे और डीकपलिंग तकनीक
 

 

 

अमेरिका और चीन के रिश्तों में एक तरफ कूटनीतिक मुलाकातों और बातचीत का दौर चल रहा है, तो दूसरी तरफ परमाणु हथियारों को लेकर आरोप-प्रत्यारोप भी सामने आ रहे हैं। अमेरिकी अधिकारियों की ओर से चीन के शिनजियांग स्थित लोप नूर परमाणु परीक्षण स्थल की गतिविधियों पर सवाल उठाए गए हैं। चर्चा इस बात की है कि क्या चीन भूमिगत सुरंगों और विशेष तकनीक के जरिए ऐसे परीक्षण कर सकता है, जिनका पता लगाना सामान्य परमाणु परीक्षणों की तुलना में मुश्किल हो।

हालांकि, उपलब्ध आधिकारिक भूकंपीय आंकड़े इस दावे की पुष्टि नहीं करते। CTBTO के मुताबिक 22 जून 2020 को उसके निगरानी तंत्र ने 12 सेकंड के अंतराल पर दो छोटे भूकंपीय संकेत दर्ज किए थे, लेकिन उनकी तीव्रता इतनी कम थी कि केवल इन संकेतों के आधार पर उनकी वजह को लेकर कोई पुख्ता निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। 
लोप नूर को लेकर क्यों उठ रहे हैं सवाल?
लोप नूर लंबे समय से चीन के परमाणु परीक्षण कार्यक्रम से जुड़ा प्रमुख स्थल रहा है। अमेरिका की ओर से समय-समय पर चीन की परमाणु गतिविधियों और इस क्षेत्र में निर्माण कार्यों को लेकर चिंता जताई गई है।
अमेरिकी अधिकारियों और विशेषज्ञों के अनुसार, इलाके में नई सुरंगों, सड़कों और अन्य ढांचों का निर्माण देखा गया है। इन्हीं गतिविधियों के आधार पर चीन की भविष्य की परमाणु क्षमता और संभावित परीक्षणों को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।
दूसरी ओर, चीन ऐसे आरोपों को खारिज करता रहा है। इसलिए फिलहाल यह कहना कि चीन ने गुप्त रूप से परमाणु परीक्षण किया है, एक स्थापित तथ्य के बजाय अमेरिकी आरोप और विशेषज्ञों के आकलन के रूप में देखा जाना चाहिए।
क्या है ‘डीकपलिंग’ तकनीक?
परमाणु परीक्षणों की निगरानी में भूकंपीय संकेत बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। भूमिगत विस्फोट से जमीन में कंपन पैदा होता है, जिसे अंतरराष्ट्रीय निगरानी नेटवर्क रिकॉर्ड कर सकते हैं।
‘डीकपलिंग’ की अवधारणा में विस्फोट और आसपास की चट्टानों के बीच एक बड़ी भूमिगत खाली जगह यानी कैविटी का इस्तेमाल किया जाता है। इसका उद्देश्य विस्फोट से पैदा होने वाले भूकंपीय संकेत को कम करना होता है।
नमक की चट्टानें इस तरह की भूमिगत संरचनाओं के लिए उपयोगी मानी जाती हैं क्योंकि वे भूमिगत कैविटी बनाने के लिए उपयुक्त हो सकती हैं। हालांकि, किसी विशेष देश द्वारा किसी विशेष स्थल पर इस तकनीक का इस्तेमाल किए जाने का दावा अलग से प्रमाणित करना पड़ता है।
2020 के भूकंपीय संकेत पर क्या कहता है CTBTO?
22 जून 2020 को CTBTO के International Monitoring System ने दो छोटे भूकंपीय घटनाक्रम रिकॉर्ड किए थे। दोनों के बीच करीब 12 सेकंड का अंतर था।

लेकिन फरवरी 2026 में CTBTO के कार्यकारी सचिव रॉबर्ट फ्लॉयड ने स्पष्ट किया कि ये घटनाएं उस स्तर से काफी नीचे थीं, जिस पर संगठन का मौजूदा सिस्टम परमाणु परीक्षण जैसी गतिविधि की पहचान के लिए सक्षम है। CTBTO ने कहा कि उपलब्ध डेटा से इन घटनाओं की वजह को लेकर विश्वास के साथ निष्कर्ष निकालना संभव नहीं है। 
यानी इन संकेतों को सीधे चीन के परमाणु परीक्षण का सबूत बताना अभी उचित नहीं है।
अमेरिका-चीन के बीच परमाणु हथियारों की चिंता क्यों बढ़ रही है?
चीन अपने परमाणु हथियारों के जखीरे का विस्तार और आधुनिकीकरण कर रहा है। SIPRI की 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, जनवरी 2026 तक चीन के पास अनुमानित 620 परमाणु हथियार थे। रिपोर्ट के मुताबिक चीन का परमाणु शस्त्रागार दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ने वाले शस्त्रागारों में शामिल है। 
SIPRI के मुताबिक जनवरी 2026 में दुनिया के नौ परमाणु-सशस्त्र देशों के पास कुल करीब 12,187 परमाणु हथियार थे। अमेरिका और रूस के पास मिलकर इनमें लगभग 86 फीसदी हथियार थे। 
ऐसे में चीन के परमाणु विस्तार को अमेरिका और अन्य देशों की सुरक्षा रणनीति के संदर्भ में भी देखा जा रहा है।
क्या फिर शुरू हो सकती है परमाणु हथियारों की होड़?
परमाणु हथियारों को लेकर दुनिया में पहले से ही तनाव बढ़ा हुआ है। SIPRI ने 2026 के अपने आकलन में कहा है कि परमाणु हथियार रखने वाले सभी नौ देशों ने 2025 में अपने शस्त्रागारों को मजबूत या आधुनिक बनाने का काम जारी रखा। संस्था ने परमाणु हथियार नियंत्रण व्यवस्था में बढ़ती अनिश्चितता और परमाणु जोखिमों की ओर भी ध्यान दिलाया है। 

ऐसे माहौल में अगर अमेरिका या कोई अन्य परमाणु शक्ति दोबारा परमाणु परीक्षण शुरू करती है, तो इसका असर वैश्विक हथियार नियंत्रण व्यवस्था पर पड़ सकता है। हालांकि, किसी नए परीक्षण की वास्तविक स्थिति और उसके संभावित प्रभाव को लेकर अलग-अलग देशों के आधिकारिक बयानों और स्वतंत्र विशेषज्ञ आकलनों में अंतर हो सकता है।
फिलहाल सबसे अहम सवाल यही है कि लोप नूर में चल रही गतिविधियां केवल निर्माण और आधुनिकीकरण से जुड़ी हैं या वास्तव में किसी नए परमाणु परीक्षण की तैयारी का हिस्सा हैं। उपलब्ध सार्वजनिक प्रमाणों के आधार पर इस सवाल का निर्णायक जवाब अभी सामने नहीं आया है।