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'श्रम कानूनों में कई सकारात्मक प्रावधान', ट्रेड यूनियन की हड़ताल के बीच सरकार के समर्थन में आए कई संगठन

 

नई दिल्ली/मुंबई, 12 फरवरी (आईएएनएस)। नए श्रम कानूनों के विरोध में ट्रेड यूनियनों समेत कई संगठनों ने गुरुवार को हड़ताल का आह्वान किया है। इसी बीच, कुछ संगठन से जुड़े नेता और कानूनी सलाहकार सरकार की तरफ से लाए गए कानूनों का समर्थन कर रहे हैं।

ट्रेड यूनियन कोऑर्डिनेशन सेंटर (टीयूसीसी) के राष्ट्रीय महासचिव एसपी तिवारी ने आईएएनएस से बात करते हुए हड़ताल को गलत ठहराया। उन्होंने कहा, "ट्रेड यूनियन मजदूरों को सुविधाएं और उनके अधिकारों के लिए काम करती है। लंबे समय से मांग होती रही है कि सभी को न्यूनतम वेतन और सामाजिक सुरक्षा मिलनी चाहिए। इसी के लिए सरकार नियम लेकर आई है, इसलिए यह हड़ताल गलत है।"

उन्होंने आरोप लगाया कि सिर्फ राजनीति के लिए यह हड़ताल हो रही है। सरकार का फैसला सराहनीय है, लेकिन राजनैतिक रूप से जुड़े ट्रेड यूनियन ही इसका विरोध कर रहे हैं। शिव प्रसाद तिवारी ने कहा कि राजनीतिक दलों के आरोप बिल्कुल निराधार हैं। पिछले 10 सालों में कई हड़तालों से राजनीतिक दलों ने मजदूर वर्ग का काफी नुकसान कराया है।

भारतीय फॉरवर्ड सीमेन यूनियन के कानूनी सलाहकार एडवोकेट अक्षय बिरवाडकर ने कहा कि सरकार की ओर से लाए गए श्रम कानूनों में कई सकारात्मक प्रावधान किए गए हैं। यह विशेष रूप से देश के असंगठित क्षेत्र के करोड़ों मजदूरों के हित में है। उन्होंने कहा कि 'सबका साथ, सबका विकास और सबका प्रयास' के मंत्र के साथ सरकार सभी को साथ लेकर चल रही है। ऐसे में बिना ठोस आधार के विरोध करना देशहित के विरुद्ध प्रतीत होता है।

अक्षय बिरवाडकर ने कहा, "वर्ष 2019 से 2025 के बीच इस विषय पर लगातार चर्चा होती रही। 2019 में विधेयक को संसद में पेश किया गया, बाद में पारित किया गया और 2025 में लागू किया गया। राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन पूरे देश में एक समान होना चाहिए और कोई भी राज्य उससे कम वेतन न दे, यह एक महत्वपूर्ण प्रावधान है। साथ ही महिला और पुरुष को समान कार्य के लिए समान वेतन मिले तथा ओवरटाइम का भुगतान दोगुनी दर से हो, इन सभी बातों को नए कानून में शामिल किया गया है।"

उन्होंने कहा कि कुछ राजनीतिक दल अपने हित साधने के लिए श्रमिकों को भ्रमित कर रहे हैं और देश के शांतिपूर्ण वातावरण को प्रभावित करने का प्रयास कर रहे हैं।

अक्षय बिरवाडकर ने यह भी कहा कि रोजगार होंगे तभी मजदूर होंगे और मजदूर होंगे तभी उनके अधिकारों की बात होगी। आज सरकारी नौकरियों की संख्या पहले की तुलना में कम है और बड़ी संख्या में लोग असंगठित या नए उभरते क्षेत्रों में कार्य कर रहे हैं। ऐसे में इन नए क्षेत्रों को कानूनी दायरे में लाना जरूरी था। ईपीएफओ, ईएसआई और अन्य सामाजिक सुरक्षा प्रावधानों के तहत इन मजदूरों को लाना एक सराहनीय कदम है, जो केंद्र सरकार की ओर से उठाया गया।

--आईएएनएस

डीसीएच/