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जीरो बजट फार्मिंग की मिसाल बनीं तापी की महिला किसान अरविंदाबेन, उगा रहीं 22 फसलें

 

तापी, 17 अप्रैल (आईएएनएस)। रासायनिक खेती के कारण स्वास्थ्य पर पड़ रहे गंभीर प्रभाव और कैंसर जैसी बीमारियों की बढ़ती आशंका ने किसानों को वैकल्पिक खेती की ओर मोड़ना शुरू कर दिया है। ऐसे में गुजरात प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देकर नई हरित क्रांति का नेतृत्व कर रहा है।

जीवामृत और बीजामृत जैसे प्राकृतिक तरीकों से खेती को पर्यावरण अनुकूल और टिकाऊ बनाने की मुहिम चल रही है। तापी जिले के सोनगढ़ तालुका के सिंहपुर गांव की महिला किसान अरविंदाबेन गामित इस मुहिम की प्रेरणादायक मिसाल हैं। उन्होंने कृषि विज्ञान केंद्र के मार्गदर्शन और सरकार के आत्मा प्रोजेक्ट के तहत मात्र 1 एकड़ जमीन पर प्राकृतिक खेती शुरू की। आज वे जीरो बजट फार्मिंग के जरिए बिना किसी रासायनिक उर्वरक या कीटनाशक के 22 प्रकार की फसलें उगा रही हैं।

महिला किसान अरविंदाबेन गामित ने आईएएनएस से बात करते हुए बताया, "रासायनिक खेती से मिट्टी बंजर हो रही थी और खर्च भी बहुत बढ़ गया था। प्राकृतिक खेती अपनाने के बाद लागत लगभग शून्य हो गई है और उत्पादन भी अच्छा मिल रहा है।"

अरविंदाबेन की सफलता का सबसे बड़ा उदाहरण उनका प्याज उत्पादन है। उन्होंने बिना किसी कीटनाशक या उर्वरक के मात्र 30 गुंठा जमीन में करीब 2 टन प्याज उगाया। इसे उन्होंने घर बैठे 25 रुपए प्रति किलो के भाव पर बेचा। महज एक हफ्ते में उन्हें लगभग 50 हजार रुपए की आमदनी हुई। यह आमदनी उन्हें पारंपरिक खेती की तुलना में कहीं ज्यादा है।

तापी के कृषि विज्ञान केंद्र में सीनियर साइंटिस्ट डॉ. सी.डी. पंड्या ने कहा कि अरविंदाबेन जैसी महिलाएं प्राकृतिक खेती को नई दिशा दे रही हैं। उन्होंने बताया, "प्राकृतिक खेती में मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है, पानी की बचत होती है और फसलें स्वस्थ होती हैं। अरविंदाबेन ने इसे सफलतापूर्वक साबित किया है।"

गुजरात में प्राकृतिक खेती अब एक जन आंदोलन का रूप ले चुकी है। मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के नेतृत्व में राज्य सरकार इस दिशा में लगातार प्रयास कर रही है। वर्तमान में गुजरात के 8 लाख से ज्यादा किसान रासायनिक खेती को अलविदा कह चुके हैं और प्राकृतिक खेती अपनाकर कम लागत में ज्यादा आय कमा रहे हैं। इस मॉडल से न सिर्फ किसानों की आय बढ़ रही है, बल्कि मिट्टी की सेहत भी सुधर रही है।

प्राकृतिक खेती किसानों के लिए फायदे का सौदा साबित हो रही है। इसमें बीजामृत से बीजों को सुरक्षा मिलती है, जबकि जीवामृत मिट्टी में सूक्ष्म जीवों को बढ़ावा देता है। परिणामस्वरूप फसलें रोग-प्रतिरोधक बनती हैं और उत्पादन बढ़ता है। अरविंदाबेन गामित जैसी महिलाएं न सिर्फ अपने परिवार की आय बढ़ा रही हैं, बल्कि पूरे गांव के लिए प्रेरणा का स्रोत भी बन रही हैं।

--आईएएनएस

एससीएच/वीसी