जरीना वहाब: जिस लड़की को कभी रंग-रूप की वजह से ठुकराया गया, वही बनी बासु चटर्जी की हीरोइन
मुंबई, 16 जुलाई (आईएएनएस)। हिंदी सिनेमा की मशहूर अभिनेत्री जरीना वहाब ने शुरुआती मुश्किलों के बावजूद फिल्मी दुनिया में अपनी खास जगह बनाई। एक दौर ऐसा भी था जब उन्हें अपने लुक और रंग-रूप को लेकर कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने इन बातों को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। अपने अभिनय के दम पर उन्होंने साबित किया कि कलाकार की असली पहचान उसका टैलेंट होता है। आज भी जरीना वहाब को फिल्म 'चितचोर' की मासूम और यादगार नायिका के रूप में याद किया जाता है।
जरीना वहाब का जन्म 17 जुलाई 1959 को आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम में हुआ था। बचपन से ही उन्हें अभिनय में रुचि थी। फिल्मों में आने का सपना पूरा करने के लिए, उन्होंने पुणे स्थित फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एफटीआईआई) से अभिनय की ट्रेनिंग ली। जरीना को शुरुआत से ही अभिनय का अच्छा ज्ञान था। वह तेलुगु, हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी भाषा जानती हैं। यही वजह रही कि उन्होंने आगे चलकर सिर्फ हिंदी ही नहीं, बल्कि दक्षिण भारतीय फिल्मों में भी काम किया।
जरीना को शुरुआती दिनों में काम पाने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा। कई बार उनके लुक और सांवले रंग को लेकर भी सवाल उठाए गए। कहा जाता है कि एक समय फिल्म इंडस्ट्री के दिग्गज राज कपूर से भी उन्हें नकारात्मक प्रतिक्रिया मिली थी लेकिन जरीना ने इन बातों को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। वह लगातार मौके तलाशती रहीं।
जरीना वहाब को पहला मौका साल 1974 में आई फिल्म 'इश्क इश्क इश्क' से मिला, जिसका निर्माण, निर्देशन और अभिनय देव आनंद ने किया था। इस फिल्म में देव आनंद के साथ जीनत अमान, शबाना आजमी, और कबीर बेदी मुख्य भूमिकाओं में थे। इस फिल्म में उन्होंने जीनत अमान की बहन का किरदार निभाया था। फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बड़ी सफलता हासिल नहीं कर पाई, लेकिन जरीना के अभिनय को लोगों ने नोटिस किया। इसके बाद उन्हें धीरे-धीरे फिल्मों के ऑफर मिलने लगे। इससे पहले उनके बारे में यह भी कहा जाता है कि उन्हें फिल्म 'गुड्डी' के लिए चुना गया था लेकिन बाद में यह भूमिका जया बच्चन को मिल गई।
साल 1976 में आई निर्देशक बासु चटर्जी की फिल्म 'चितचोर' ने जरीना वहाब की किस्मत बदल दी। बासु चटर्जी के निर्देशन में बनी इस फिल्म में उन्होंने गीता नामक एक साधारण लड़की का किरदार निभाया था। अमोल पालेकर के साथ उनकी जोड़ी को दर्शकों ने खूब पसंद किया। फिल्म की सफलता के बाद जरीना घर-घर पहचानी जाने लगीं।
इसके बाद जरीना वहाब ने कई शानदार फिल्मों में काम किया। 'घरौंदा', 'अगर', 'जज्बात', 'सावन को आने दो', 'गोपाल कृष्णा', 'नैया', 'सितारा' और 'अनपढ़' जैसी फिल्मों में उनके अभिनय को काफी सराहा गया। फिल्म 'घरौंदा' के लिए उन्हें साल 1977 में फिल्मफेयर अवॉर्ड की बेस्ट एक्ट्रेस कैटेगरी में नामांकन भी मिला था। हिंदी फिल्मों के अलावा, उन्होंने तमिल, तेलुगु और मलयालम सिनेमा में भी अपनी अलग पहचान बनाई।
जरीना वहाब ने अपने करियर में कई तरह के किरदार निभाए। समय के साथ उन्होंने मां, सास और मजबूत महिला किरदारों को भी पर्दे पर उतारा। साल 2010 में आई फिल्म 'माय नेम इज खान' में उन्होंने शाहरुख खान के किरदार रिजवान खान की मां का रोल निभाया, जिसे दर्शकों ने पसंद किया। इसके बाद भी वह फिल्मों, टीवी सीरियल्स और वेब सीरीज में लगातार काम करती रहीं।
निजी जिंदगी की बात करें तो जरीना वहाब ने साल 1986 में अभिनेता आदित्य पंचोली से शादी की थी। दोनों की मुलाकात फिल्म 'कलंक का टीका' के सेट पर हुई थी। उनके दो बच्चे हैं, बेटी सना और बेटा सूरज पंचोली।
--आईएएनएस
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