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यादों में उस्ताद राशिद खान : बचपन में रियाज से थी चिढ़, ऐसे बने संगीत के सरताज

 

नई दिल्ली, 30 जून (आईएएनएस)। भारतीय शास्त्रीय संगीत के महान गायक उस्ताद राशिद खान का नाम आज सुरों की दुनिया में बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि बचपन में उन्हें संगीत और रियाज से बिल्कुल लगाव नहीं था। जिस बच्चे को घंटों बैठकर सुर साधना बोझ लगती थी, वही आगे चलकर शास्त्रीय संगीत का ऐसा सितारा बना, जिसकी गायकी ने दुनिया भर के संगीत प्रेमियों को अपना दीवाना बना दिया।

उस्ताद राशिद खान का जन्म 1 जुलाई 1968 को उत्तर प्रदेश के बदायूं में हुआ था। उनका परिवार संगीत की समृद्ध परंपरा से जुड़ा था। वे रामपुर-सहसवान घराने से ताल्लुक रखते थे। उनके नाना उस्ताद निसार हुसैन खान, मामा उस्ताद गुलाम मुस्तफा खान और परिवार के कई सदस्य भारतीय शास्त्रीय संगीत के प्रतिष्ठित नाम थे। ऐसे माहौल में जन्म लेने के बावजूद बचपन में राशिद खान की रुचि गायकी में बिल्कुल नहीं थी। उन्हें रियाज करना कठिन और उबाऊ लगता था।

फिर उनकी जिंदगी में एक ऐसा दर्द आया जिसने सब कुछ बदल दिया। महज सात साल की उम्र में उन्होंने अपनी मां को खो दिया। इस घटना ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया। इसके बाद उनकी जिंदगी ने नई दिशा पकड़ ली और उन्होंने संगीत की गंभीर साधना शुरू की।

मुंबई में संगीत की कड़ी तालीम शुरू हुई। सुबह से शाम तक घंटों रियाज और फिर स्कूल की पढ़ाई। धीरे-धीरे राशिद खान ने संगीत को पूरी तरह अपना लिया। जो रियाज कभी उन्हें बोझ लगता था, वही उनकी सबसे बड़ी ताकत बन गया।

उनकी मेहनत का पहला बड़ा फल तब मिला, जब महज 11 साल की उम्र में उन्होंने आईटीसी संगीत सम्मेलन में अपनी पहली बड़ी मंचीय प्रस्तुति दी। उस कार्यक्रम में देश के कई दिग्गज संगीतकार मौजूद थे। जैसे ही उनकी प्रस्तुति समाप्त हुई, पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। कई बड़े-बड़े उस्ताद अपनी जगह से खड़े होकर इस बाल कलाकार का सम्मान कर रहे थे।

राशिद खान की गायकी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे हर सुर को पूरी आत्मा से जीते थे। वे एक-एक स्वर पर घंटों मेहनत करते थे। उनकी गायकी में रामपुर-सहसवान घराने की परंपरा के साथ-साथ उस्ताद अमीर खान और पंडित भीमसेन जोशी की शैली की झलक भी दिखाई देती थी। यही कारण था कि उनकी आवाज में गहराई, मिठास और भावनाओं का अद्भुत संगम सुनाई देता था।

उन्होंने बॉलीवुड में भी अपनी अलग पहचान बनाई। फिल्म 'जब वी मेट' का मशहूर गीत 'आओगे जब तुम' आज भी लोगों के दिलों में बसा हुआ है। इसके अलावा 'माई नेम इज खान', 'राज 3', 'मंटो' और 'शादी में जरूर आना' जैसी फिल्मों में भी उनकी आवाज ने गीतों को खास बना दिया।

वह मंच पर जितने गंभीर दिखाई देते थे, निजी जीवन में उतने ही सरल और मिलनसार थे। दोस्तों के साथ महफिलें जमाना, जूनियर गायकों को सिखाना और संगीत पर खुलकर चर्चा करना उन्हें बेहद पसंद था। वे हमेशा नई पीढ़ी को शास्त्रीय संगीत से जोड़ने का प्रयास करते रहे।

उनकी कला को कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया। वर्ष 2006 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया। उसी वर्ष उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार भी मिला। इसके अलावा ग्लोबल इंडियन म्यूजिक अकादमी (जीआईएमए) अवॉर्ड और बंगा भूषण सहित कई प्रतिष्ठित सम्मान भी उनके नाम रहे।

लंबे समय से प्रोस्टेट कैंसर से जूझ रहे उस्ताद राशिद खान का 9 जनवरी 2024 को कोलकाता में 55 वर्ष की आयु में निधन हो गया।

--आईएएनएस

पीआईएम/एएस