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यादों में सांकृत्यायन: सफर को ही बना लिया जीवन, कलम से रच डाली नई दुनिया

 

नई दिल्ली, 8 अप्रैल (आईएएनएस)। 9 अप्रैल… सिर्फ एक तारीख नहीं है। इसी दिन 1893 में उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के एक छोटे से गांव में जन्म हुआ था एक ऐसे लेखक का जिसने लोगों का दुनिया को देखने का नजरिया ही बदल दिया। हम बात कर रहे हैं राहुल सांकृत्यायन की, जिसने सफर को ही अपना जीवन बना लिया और अपनी कलम से एक नई दुनिया रच दी। वे सिर्फ एक लेखक नहीं थे बल्कि चलते-फिरते विश्वविद्यालय थे, जहां अनुभव ही ज्ञान था और दुनिया ही किताब।

राहुल सांकृत्यायन का जन्म उनके ननिहाल अर्थात पंदहा ग्राम में हुआ और वहीं उनका बाल्यकाल भी बीता। तब लोग उन्हें केदारनाथ पांडे के नाम से जानते और पुकारते थे। बचपन से ही उनके भीतर कुछ अलग करने की बेचैनी थी। नाना से सुनी फौज की, दूर देशों की, पहाड़ों और नदियों की कहानियां उनके मन में जैसे बीज बनकर बैठ गईं। और फिर एक दिन छोटी-सी घटना (घी की मटकी गिर जाना) ने उन्हें घर की चौखट पार करने का साहस दे दिया।

पहले बनारस, फिर कलकत्ता, फिर हिमालय… और धीरे-धीरे यह सफर इतना लंबा हो गया कि देश की सीमाएं भी छोटी लगने लगीं। वे तिब्बत पहुंचे, लंका गए, रूस की यात्रा की और यूरोप तक जा पहुंचे लेकिन उनकी ये यात्राएं सिर्फ घूमने तक सीमित नहीं थी। उनके लिए हर जगह एक नई किताब थी। जहां भी गए, वहां की भाषा सीखी, वहां के लोगों के साथ रहे, उनके जीवन को समझा। यही वजह है कि उनकी किताबें सिर्फ ज्ञान से नहीं बल्कि अनुभवों से भी भरी हुई हैं।

उनकी एक खास बात थी कि वे कभी किसी एक सोच में अटके नहीं। जन्म से ब्राह्मण परिवार में पले-बढ़े लेकिन उन्होंने हर चीज को सवाल की नजर से देखा। पहले सनातन धर्म, फिर आर्य समाज, फिर बौद्ध धर्म और बाद में साम्यवाद वे हर विचार को समझते गए और जो सही लगा, उसे अपनाते गए। वे मानते थे कि ज्ञान को सिर्फ मान लेना नहीं चाहिए उसे परखना भी चाहिए।

राहुल सांकृत्यायन की लेखनी भी उनके सफर की तरह ही दिलचस्प थी। उन्होंने 150 से ज्यादा किताबें लिखीं। वे जहां भी जाते, जो भी देखते, उसे शब्दों में ढाल देते।

उनकी प्रसिद्ध किताब 'वोल्गा से गंगा' पढ़ते हुए ऐसा लगता है जैसे हम हजारों साल की यात्रा कर रहे हों। वहीं 'मेरी जीवन यात्रा' में उनका अपना जीवन इतनी सादगी और सच्चाई से लिखा गया है कि पाठक उनसे जुड़ जाता है।

उनकी भाषा भी बहुत सरल और सीधी थी। वे कठिन शब्दों में नहीं, बल्कि आम बोलचाल की भाषा में लिखते थे, ताकि हर कोई उन्हें समझ सके। यही कारण है कि उनकी किताबें सिर्फ विद्वानों के लिए नहीं बल्कि आम लोगों के लिए भी उतनी ही उपयोगी हैं।

राहुल सांकृत्यायन सिर्फ एक लेखक या यात्री नहीं थे बल्कि वे एक कर्मशील इंसान भी थे। उन्होंने आजादी के आंदोलन में हिस्सा लिया, जेल गए और किसानों व मजदूरों के लिए आवाज उठाई। वे मानते थे कि सिर्फ ज्ञान ही काफी नहीं है बल्कि उस ज्ञान का उपयोग समाज के लिए होना चाहिए।

14 अप्रैल 1963 को राहुल सांकृत्यायन इस दुनिया को छोड़ गए लेकिन उनकी सोच, उनकी किताबें और उनकी यात्राएं आज भी पाठकों को एक जगह से दूसरी जगह पर पहुंचा देती हैं।

--आईएएनएस

पीआईएम/पीएम