World Environment Day Special: महासागर के बीच तैर रहा कई देशों से बढ़ा कचरे का द्वीप, जाने कहाँ से आता है इतना वेस्ट?
पर्यावरण संरक्षण और सस्टेनेबिलिटी के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए हर साल 5 जून को 'विश्व पर्यावरण दिवस' मनाया जाता है। हालाँकि चर्चाएँ अक्सर प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और संरक्षण पर केंद्रित होती हैं, लेकिन पर्यावरण से जुड़े सबसे चिंताजनक संकटों में से एक प्रशांत महासागर के बीचों-बीच तैर रहा है। 'ग्रेट पैसिफिक गारबेज पैच' के नाम से जाना जाने वाला प्लास्टिक कचरे का यह विशाल ढेर इतना बड़ा हो गया है कि अब यह कई देशों से भी बड़े इलाके में फैला हुआ है।
'ग्रेट पैसिफिक गारबेज पैच' क्या है?
'ग्रेट पैसिफिक गारबेज पैच' को अक्सर "प्लास्टिक आइलैंड" (प्लास्टिक का द्वीप) कहा जाता है। यह उत्तरी प्रशांत महासागर में कैलिफ़ोर्निया (USA) और हवाई द्वीपों के बीच स्थित है। आम धारणा के विपरीत, यह कोई ठोस द्वीप नहीं है जिस पर लोग चल सकें। इसके बजाय, यह एक विशाल क्षेत्र है जहाँ समुद्र की तेज़ लहरों और धाराओं के कारण लाखों टन तैरता हुआ प्लास्टिक कचरा जमा हो गया है। पिछले कुछ वर्षों में, दुनिया के विभिन्न हिस्सों से आया प्लास्टिक कचरा इस क्षेत्र में फंस गया है।
कचरे का यह तैरता हुआ पैच कितना बड़ा है?
'ग्रेट पैसिफिक गारबेज पैच' का आकार चौंकाने वाला है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह पैच लगभग 16 लाख (1.6 मिलियन) वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। यह पैच फ्रांस के आकार से लगभग तीन गुना और भारत के आकार का लगभग आधा है। इस पैच में 80,000 मीट्रिक टन से अधिक प्लास्टिक कचरा है, जिसमें पानी में तैरते प्लास्टिक के लगभग 1.8 ट्रिलियन (1.8 लाख करोड़) टुकड़े शामिल हैं। हर साल समुद्री इकोसिस्टम में और अधिक कचरा आने के कारण इसका आकार बढ़ता जा रहा है।
कौन से देश सबसे ज़्यादा कचरा फैलाते हैं?
पर्यावरण संगठनों और समुद्री वैज्ञानिकों की रिसर्च से पता चलता है कि कचरे का एक बड़ा हिस्सा कुछ औद्योगिक देशों से आता है। रिपोर्टों के अनुसार, इस क्षेत्र में पाए जाने वाले 90% से अधिक कचरे का स्रोत छह देश हैं। इनमें जापान, चीन, दक्षिण कोरिया, USA, ताइवान और कनाडा शामिल हैं।
इसका इंसानों पर क्या असर पड़ता है? इसके नतीजे सिर्फ़ समुद्री इकोसिस्टम तक ही सीमित नहीं हैं। मछलियाँ और समुद्री जीव माइक्रोप्लास्टिक खा लेते हैं, जो बाद में इंसानी फ़ूड चेन (खाद्य श्रृंखला) में प्रवेश कर सकता है। वैज्ञानिक माइक्रोप्लास्टिक के संपर्क में आने से सेहत पर पड़ने वाले लंबे समय के असर का अध्ययन कर रहे हैं, लेकिन बढ़ते सबूत बताते हैं कि ये पर्यावरण और इंसानी सेहत, दोनों के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं।