Women Death Penalty: भारत में अब तक कितनी महिलाओं को मिली फांसी की सजा? सिर्फ एक को दी गई थी मृत्युदंड
उत्तर प्रदेश के मेरठ में पति की हत्या के दो अलग-अलग मामलों में महिलाओं और उनके साथियों को मौत की सजा सुनाए जाने के बाद देश में महिला दोषियों को दिए जाने वाले मृत्युदंड को लेकर चर्चा तेज हो गई है। अदालतों के फैसलों के बीच एक अहम सवाल यह भी है कि भारत में अब तक कितनी महिलाओं को फांसी की सजा सुनाई गई और कितनी को वास्तव में फांसी दी गई।
नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में निचली अदालतों द्वारा सुनाई गई मौत की सजा के कई फैसले हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में बदल दिए जाते हैं। यही वजह है कि निचली अदालत से मृत्युदंड मिलने का अर्थ यह नहीं है कि दोषी को तुरंत फांसी दे दी जाएगी।
भारत में सिर्फ एक महिला को दी गई थी फांसी
रिपोर्ट में दिए गए विवरण के मुताबिक, रतन बाई जैन आजादी के बाद भारत में कानूनी रूप से फांसी पाने वाली एकमात्र महिला थीं। उन्हें तीन बच्चियों की हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया था और 3 जनवरी 1955 को दिल्ली की तिहाड़ जेल में फांसी दी गई थी।
इसके बाद किसी दूसरी महिला को भारत में फांसी दिए जाने का मामला सामने नहीं आया है। हालांकि, कई महिलाओं को अलग-अलग आपराधिक मामलों में निचली अदालतों से मृत्युदंड सुनाया जा चुका है।
हर मौत की सजा पर हाईकोर्ट की मंजूरी जरूरी
भारत में मृत्युदंड की प्रक्रिया कई कानूनी चरणों से गुजरती है। निचली अदालत द्वारा मौत की सजा सुनाए जाने के बाद संबंधित मामले को हाईकोर्ट की पुष्टि के लिए भेजना जरूरी होता है। इसके बाद दोषी को कानून के अनुसार सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का अवसर मिल सकता है।
दोषी समीक्षा याचिका और निर्धारित परिस्थितियों में क्यूरेटिव याचिका भी दाखिल कर सकता है। इसके अलावा, राष्ट्रपति या राज्यपाल के समक्ष दया याचिका का विकल्प भी उपलब्ध होता है।
इस पूरी प्रक्रिया का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मृत्युदंड जैसे गंभीर फैसले पर सभी जरूरी न्यायिक और संवैधानिक पहलुओं की जांच हो सके।
2016 से 2025 के बीच मौत की सजाओं के कितने फैसले कायम रहे?
नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, 2016 से 2025 के दौरान निचली अदालतों ने कुल 1,085 मामलों में मौत की सजा सुनाई। इनमें से 106 मामलों में सजा कायम रही, जबकि कई मामलों में ऊपरी अदालतों ने फैसले बदल दिए या अन्य राहत दी।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि 31 दिसंबर 2025 तक देश में 574 लोग मृत्युदंड का इंतजार कर रहे थे। इनमें 24 महिलाएं शामिल थीं।
आंकड़े यह दिखाते हैं कि निचली अदालत से मौत की सजा सुनाए जाने और उस सजा के अंतिम रूप से लागू होने के बीच लंबी न्यायिक प्रक्रिया होती है।
शबनम का मामला भी चर्चा में
उत्तर प्रदेश की शबनम को अपने परिवार के सात सदस्यों की हत्या के मामले में 2010 में मौत की सजा सुनाई गई थी। उनका मामला देश में महिला दोषियों को दिए गए मृत्युदंड के चर्चित मामलों में शामिल है।
उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक, उनकी दया याचिकाएं खारिज होने के बावजूद 2025 के अंत तक उन्हें फांसी नहीं दी गई थी। यह मामला भी बताता है कि मृत्युदंड की सजा सुनाए जाने के बाद उसे लागू करने से पहले कई कानूनी प्रक्रियाएं पूरी करनी होती हैं।
मेरठ में दो मामलों ने बढ़ाई चर्चा
मेरठ में पति की हत्या के मामले में रविता और उसके प्रेमी अमरदीप को जिला अदालत ने मृत्युदंड सुनाया। आरोपों के अनुसार, हत्या को सांप के काटने से हुई मौत जैसा दिखाने की कोशिश की गई थी। अदालत ने मामले में उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर फैसला सुनाया।
इससे पहले 14 अक्टूबर को कथित नीले ड्रम हत्याकांड में मुस्कान और उसके साथी साहिल को भी मौत की सजा सुनाए जाने की खबर सामने आई थी।
इन मामलों के बाद महिला दोषियों को मृत्युदंड दिए जाने और भारत में फांसी की सजा की न्यायिक प्रक्रिया पर फिर चर्चा शुरू हो गई है। हालांकि, इन मामलों में अंतिम स्थिति संबंधित अपीलों और ऊपरी अदालतों के फैसलों पर निर्भर करेगी।
मृत्युदंड का फैसला अंतिम नहीं होता
भारत में किसी महिला या पुरुष को निचली अदालत से मौत की सजा मिलने के बाद उसे तुरंत फांसी नहीं दी जा सकती। हाईकोर्ट की पुष्टि, अपील और अन्य कानूनी विकल्पों की प्रक्रिया पूरी होना जरूरी है।
इसलिए मृत्युदंड सुनाए जाने, सजा के अंतिम रूप से बरकरार रहने और वास्तव में फांसी दिए जाने के आंकड़ों को अलग-अलग समझना महत्वपूर्ण है।