☰
×

अंडरवर्ल्ड को बॉलीवुड से इतना लगाव क्यों? हाजी मस्तान से दाऊद और लॉरेंस बिश्नोई तक, जानिए 4 बड़ी वजहें

 

अंडरवर्ल्ड के पास ताकत, पैसा और खौफ के दम पर राजनीति में अपनी पकड़ बनाने के रास्ते भी रहे हैं। इसके बावजूद हाजी मस्तान से लेकर दाऊद इब्राहिम और अब लॉरेंस बिश्नोई गैंग तक, अपराध जगत का बॉलीवुड से जुड़ाव बार-बार चर्चा में आता रहा है। 18 अक्टूबर 2026 को टाइगर श्रॉफ पर फायरिंग की घटना के बाद एक बार फिर सवाल उठ रहा है कि आखिर अपराधी फिल्म इंडस्ट्री को ही निशाना क्यों बनाते हैं?

इसके पीछे सिर्फ फिल्मों का आकर्षण नहीं, बल्कि पैसे का लेन-देन, बड़े सितारों तक पहुंच बनाने की चाह, धमकी के जरिए दबदबा कायम करना और फिल्म उद्योग की पुरानी वित्तीय कमजोरियां जैसे कई कारण बताए जाते हैं। आइए समझते हैं कि दशकों से अंडरवर्ल्ड और बॉलीवुड के बीच रिश्तों की चर्चा क्यों होती रही है।

वजह नंबर 1: फिल्मों में पैसा लगाने का मौका

1990 के दशक में भारतीय फिल्म उद्योग को आज की तरह आसानी से बैंक और संस्थागत वित्त उपलब्ध नहीं था। ऐसे में कई फिल्मों के लिए निजी फाइनेंसरों और साहूकारों से पैसा जुटाया जाता था। कुछ मामलों में यह रकम अपराध जगत से जुड़े लोगों की भी होती थी।

अंडरवर्ल्ड के लिए फिल्में पैसा लगाने और कारोबार में अपनी पकड़ बनाने का एक जरिया बन गईं। फिल्म निर्माण में निवेश, वितरण और बॉक्स ऑफिस से होने वाली कमाई के बीच पैसों के लेन-देन की जटिलता का गलत इस्तेमाल भी किया जा सकता था। हालांकि, हर फिल्म या हर निजी निवेश को अवैध धन से जोड़ना सही नहीं होगा।

पत्रकार और लेखक हुसैन जैदी की लिखी बातों के मुताबिक, दाऊद इब्राहिम का हिंदी फिल्मों और फिल्मी सितारों में खासा दिलचस्पी थी। इसी दौर में फिल्म जगत में अंडरवर्ल्ड के प्रभाव और कथित वित्तीय संबंधों को लेकर कई मामले सामने आए।

राजनीति में पैसा लगाने के लिए चुनाव, संगठन और सत्ता से जुड़े लंबे समीकरणों की जरूरत होती है। इसके मुकाबले फिल्मों में निवेश करके मनोरंजन जगत से सीधे जुड़ने का रास्ता अपराधियों को आकर्षक लग सकता था।

वजह नंबर 2: बड़े सितारों के साथ नजदीकी दिखाने की चाह

अंडरवर्ल्ड के लिए पैसा केवल कमाई का जरिया नहीं, बल्कि अपनी ताकत दिखाने का माध्यम भी रहा। राजनीति में प्रभाव दिखाने के लिए चुनाव जीतना और सार्वजनिक समर्थन हासिल करना पड़ता है, जबकि बॉलीवुड के चर्चित सितारों तक पहुंच बनाकर अपराधी अपनी पहचान और रसूख का प्रदर्शन कर सकते थे।दाऊद इब्राहिम के बारे में कई रिपोर्टों में दावा किया गया है कि वह हिंदी फिल्म जगत के कुछ बड़े सितारों को दुबई में आयोजित कार्यक्रमों और दावतों में बुलाता था। महंगे तोहफों और फिल्मी हस्तियों के साथ नजदीकी की चर्चाएं भी उसके प्रभाव को दिखाने के तौर पर देखी जाती थीं।

इस तरह की नजदीकी का संदेश साफ था—अपराध जगत से जुड़ा व्यक्ति उन सितारों तक पहुंच रखता है, जिन्हें लाखों लोग पसंद करते हैं। इससे उसकी सामाजिक पहचान और दबदबे की छवि मजबूत हो सकती थी।पूर्व पुलिस अधिकारियों और अपराध जगत पर लिखने वाले लेखकों ने भी इस बात की ओर ध्यान दिलाया है कि फिल्मों में तस्करों और गैंगस्टरों को कई बार बेहद प्रभावशाली किरदारों के रूप में दिखाया गया। इससे अपराधियों की छवि और उनके वास्तविक प्रभाव को लेकर समाज में अलग-अलग धारणाएं बनीं।

वजह नंबर 3: धमकी देकर पूरी इंडस्ट्री में डर फैलाना

बॉलीवुड में अंडरवर्ल्ड की दिलचस्पी का एक बड़ा पहलू कथित तौर पर धमकी, रंगदारी और दबाव की रणनीति भी रहा है। किसी एक निर्माता, अभिनेता या कारोबारी को निशाना बनाने से बाकी लोगों में भी डर पैदा हो सकता है।1990 के दशक में दाऊद इब्राहिम और छोटा शकील के नेटवर्क से जुड़े लोगों पर फिल्म निर्माताओं और निर्देशकों को धमकाने, जबरन वसूली करने और फिल्मों में अपनी पसंद के लोगों को मौका देने के लिए दबाव बनाने जैसे आरोप लगे थे।

कुछ मामलों में फिल्म जगत से जुड़े लोगों पर हमले और हत्याएं भी हुईं। वर्ष 1997 में फिल्म निर्माता मुकेश दुग्गल की हत्या को उस दौर में अपराध जगत और फिल्म कारोबार के बीच तनाव के संदर्भ में देखा गया था।ऐसी घटनाओं का असर केवल संबंधित व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। पूरी इंडस्ट्री में असुरक्षा का माहौल बन सकता है और कारोबारी फैसलों पर भी दबाव पड़ सकता है।टाइगर श्रॉफ पर फायरिंग की हालिया घटना के संदर्भ में भी डर फैलाने की आशंका पर चर्चा हो रही है। हालांकि, किसी घटना के पीछे का वास्तविक मकसद जांच और आधिकारिक पुष्टि के आधार पर ही तय किया जाना चाहिए।

वजह नंबर 4: फिल्म उद्योग में बैंक फाइनेंसिंग का अभाव

भारतीय फिल्म उद्योग में बदलाव तब आया, जब वर्ष 2000 में सरकार ने इसे आधिकारिक तौर पर उद्योग का दर्जा दिया। इसके बाद फिल्म निर्माण के लिए संस्थागत वित्त, कॉर्पोरेट निवेश और बड़े स्टूडियो की भूमिका बढ़ने लगी।इस बदलाव से फिल्म निर्माण की वित्तीय व्यवस्था पहले की तुलना में अधिक संगठित हुई। बैंक और संस्थागत निवेशकों की भागीदारी बढ़ने से अनौपचारिक फाइनेंसिंग पर निर्भरता कम करने में मदद मिली।इसके साथ ही अंडरवर्ल्ड के खिलाफ पुलिस और जांच एजेंसियों की कार्रवाई भी महत्वपूर्ण रही। महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम (MCOCA) जैसे कानूनों और संगठित अपराध नेटवर्क पर कार्रवाई ने अपराधियों के लिए अपनी गतिविधियां चलाना कठिन बनाया।

हालांकि, संगठित वित्तीय व्यवस्था आने का मतलब यह नहीं कि अपराध जगत का प्रभाव पूरी तरह खत्म हो गया। हाल के वर्षों में फिल्मी हस्तियों को धमकियां मिलने और हमलों की घटनाओं ने एक बार फिर सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ाई हैं।लॉरेंस बिश्नोई गैंग का नाम भी अभिनेता सलमान खान से जुड़े धमकी और सुरक्षा मामलों में सामने आया है। ऐसे मामलों में गैंग की ओर से किए गए दावों और जांच एजेंसियों द्वारा स्थापित तथ्यों के बीच अंतर समझना जरूरी है।

फिर राजनीति में ज्यादा सक्रिय क्यों नहीं हुआ अंडरवर्ल्ड?

अपराध जगत और राजनीति के बीच संबंधों के आरोप भारत में नए नहीं हैं। अलग-अलग समय पर अपराधियों के नेताओं से संपर्क, चुनावी फंडिंग और कुछ अपराधियों के चुनाव लड़ने के मामले सामने आए हैं।लेकिन राजनीति में लंबे समय तक प्रभाव बनाए रखने के लिए केवल पैसा और डर काफी नहीं होता। इसके लिए संगठन, जनसमर्थन, चुनावी रणनीति और राजनीतिक नेटवर्क की जरूरत होती है।इसके मुकाबले बॉलीवुड में किसी चर्चित सितारे से संबंध बनाना या किसी फिल्मी हस्ती को निशाना बनाना कम समय में व्यापक चर्चा पैदा कर सकता है। यही वजह है कि फिल्म इंडस्ट्री अपराधियों के लिए आर्थिक हितों के साथ-साथ प्रतिष्ठा और दबदबे का माध्यम भी बनती रही।

बॉलीवुड और अंडरवर्ल्ड का रिश्ता आखिर बताता क्या है?

हाजी मस्तान और दाऊद इब्राहिम के दौर से लेकर आज के संगठित अपराध नेटवर्क तक, बॉलीवुड और अंडरवर्ल्ड के रिश्तों की कहानी में पैसा, प्रसिद्धि, डर और प्रभाव जैसे पहलू बार-बार सामने आते हैं।फिल्म उद्योग के वित्तीय ढांचे में सुधार और कानून प्रवर्तन एजेंसियों की कार्रवाई के बावजूद फिल्मी हस्तियों की सुरक्षा एक अहम मुद्दा बनी हुई है। टाइगर श्रॉफ पर फायरिंग की घटना ने भी इसी बहस को फिर से चर्चा में ला दिया है।आखिरकार, अपराध जगत की फिल्म इंडस्ट्री में दिलचस्पी को सिर्फ सितारों के आकर्षण से नहीं समझा जा सकता। इसके पीछे आर्थिक लाभ, सामाजिक रसूख और दूसरों पर दबाव बनाने की कोशिश जैसे कई कारण हो सकते हैं।