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लॉरेंस बिश्नोई तक क्यों नहीं पहुंच पा रही मुंबई पुलिस? जेल में बंद गैंगस्टर और कानून की पेचीदगी पर उठे सवाल

 

मुंबई में पिछले कुछ वर्षों के दौरान हुई कई हाई-प्रोफाइल आपराधिक घटनाओं में लॉरेंस बिश्नोई गैंग का नाम सामने आया है। अभिनेता सलमान खान के घर के बाहर फायरिंग, एनसीपी नेता बाबा सिद्दीकी की हत्या, फिल्म निर्देशक रोहित शेट्टी से कथित रंगदारी की मांग और अभिनेता टाइगर श्रॉफ पर फायरिंग के मामले ने एक बार फिर इस गैंग की गतिविधियों को लेकर चर्चा तेज कर दी है।

इन घटनाओं के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि गुजरात की साबरमती जेल में बंद लॉरेंस बिश्नोई से मुंबई पुलिस सीधे पूछताछ क्यों नहीं कर पा रही है? रिपोर्ट के मुताबिक, इसके पीछे जेल से कैदियों को बाहर ले जाने पर लागू कानूनी प्रतिबंध एक अहम वजह है। हालांकि, अलग-अलग मामलों में आरोपों और उनकी जांच की स्थिति को समझना भी जरूरी है।

क्या है वह कानूनी प्रतिबंध, जो मुंबई पुलिस के लिए चुनौती बना?

लॉरेंस बिश्नोई को अप्रैल 2023 में गुजरात एटीएस ने ड्रग्स तस्करी से जुड़े एक मामले में गिरफ्तार किया था। इसके बाद उसे साबरमती जेल में रखा गया। इसी दौरान केंद्र सरकार की ओर से उसके संबंध में आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 268 के तहत आदेश लागू किए जाने की बात सामने आई।

इस प्रावधान के तहत सरकार कुछ परिस्थितियों में किसी कैदी को जेल से बाहर ले जाने पर रोक लगा सकती है। इसके पीछे सुरक्षा और कानून-व्यवस्था से जुड़े कारण हो सकते हैं। ऐसे प्रतिबंधों के कारण किसी दूसरे राज्य की पुलिस के लिए आरोपी को अपनी हिरासत में लेकर पूछताछ करना मुश्किल हो सकता है।

हालांकि, यह कहना कि इस आदेश के कारण किसी भी अदालत के लिए प्रोडक्शन वारंट जारी करना पूरी तरह असंभव है, कानूनी स्थिति को जरूरत से ज्यादा सरल बनाना होगा। वास्तविक स्थिति संबंधित आदेश, लागू कानून और अदालत के निर्देशों पर निर्भर करती है।

कस्टडी में पूछताछ और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में क्या अंतर है?

किसी गंभीर आपराधिक मामले की जांच में आरोपी से सीधे पूछताछ करना जांच एजेंसियों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। पुलिस हिरासत में पूछताछ के दौरान जांचकर्ता उपलब्ध सबूतों, संदिग्धों के बयानों और अन्य जानकारियों के आधार पर सवाल कर सकते हैं।

वहीं, जेल में पूछताछ या वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए बयान दर्ज करने की प्रक्रिया अलग हो सकती है। यदि किसी आरोपी की हिरासत नहीं मिलती, तो जांच एजेंसी को उपलब्ध कानूनी प्रक्रियाओं और सबूतों के आधार पर आगे बढ़ना पड़ता है।

लॉरेंस बिश्नोई से सीधे पूछताछ नहीं हो पाने की स्थिति में मुंबई पुलिस के सामने यह चुनौती बनी रहती है कि विभिन्न घटनाओं में कथित तौर पर शामिल शूटरों, हथियार सप्लायरों और अन्य संदिग्धों से मिली जानकारी को कैसे जोड़ा जाए और कथित नेटवर्क की भूमिका को कैसे स्थापित किया जाए।

अनमोल बिश्नोई का मामला भी चर्चा में

लॉरेंस बिश्नोई के छोटे भाई अनमोल बिश्नोई का नाम भी कई आपराधिक मामलों की जांच में सामने आया है। उसके संबंध में भी जेल और हिरासत से जुड़े कानूनी पहलुओं पर चर्चा होती रही है।

अनमोल पर गैंग की गतिविधियों को संचालित करने और शूटरों के संपर्क में रहने जैसे आरोप लगाए गए हैं। हालांकि, जेल के भीतर से किसी खास वारदात की योजना बनाने, हथियार या पैसे पहुंचाने अथवा टारगेट तय करने जैसे दावों की पुष्टि संबंधित जांच और उपलब्ध सबूतों के आधार पर ही की जानी चाहिए।

जेल में बंद आरोपियों के कथित नेटवर्क की जांच करना सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती है। ऐसे मामलों में यह पता लगाना जरूरी होता है कि निर्देश किसने दिए, उनका पालन किसने किया और अपराध में किन लोगों की क्या भूमिका रही।

छोटा राजन का मामला भी रहा था चर्चा में

साल 2015 में इंडोनेशिया के बाली से गिरफ्तार किए जाने के बाद अंडरवर्ल्ड डॉन छोटा राजन को भारत लाया गया था। उसे मुंबई पुलिस की सीधी हिरासत में सौंपने के बजाय दिल्ली की तिहाड़ जेल में रखा गया था।

उस समय छोटा राजन ने मुंबई पुलिस के कुछ अधिकारियों पर दाऊद इब्राहिम से संबंध रखने के आरोप लगाए थे और मुंबई में अपनी जान को खतरा बताया था। ये उसके द्वारा लगाए गए आरोप थे। सुरक्षा कारणों से उसे मुंबई से दूर रखने का फैसला उस समय चर्चा का विषय बना था।

हालांकि, छोटा राजन और लॉरेंस बिश्नोई के मामलों की कानूनी परिस्थितियां एक जैसी थीं या नहीं, इसका आकलन संबंधित आदेशों और तथ्यों के आधार पर ही किया जा सकता है।

सबसे बड़ा सवाल: गैंग के नेटवर्क को कैसे तोड़ा जाए?

लॉरेंस बिश्नोई गैंग से जुड़े मामलों ने एक बार फिर संगठित अपराध की जांच, जेल की सुरक्षा और अलग-अलग राज्यों की पुलिस के बीच समन्वय जैसे मुद्दों को चर्चा में ला दिया है।

जांच एजेंसियों के सामने चुनौती सिर्फ आरोपियों को गिरफ्तार करने की नहीं, बल्कि वारदातों के पीछे कथित निर्देश देने वालों, आर्थिक मदद करने वालों और अन्य सहयोगियों की भूमिका को सबूतों के साथ सामने लाने की भी है।

अब अहम सवाल यह है कि कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए जांच एजेंसियां कथित नेटवर्क की कमांड चेन तक कैसे पहुंचेंगी और ऐसी वारदातों को रोकने के लिए क्या कदम उठाए जाएंगे।