आखिर क्यों साल में तीन बार मनाया जाता है बिहू? जानिए इसके पीछे की खास वजह
बिहू असम का सबसे प्रमुख और पारंपरिक त्योहार माना जाता है, जिसे पूरे राज्य में बड़े ही उत्साह और धूमधाम से मनाया जाता है। खास बात यह है कि यह त्योहार साल में एक बार नहीं, बल्कि तीन बार मनाया जाता है। ऐसे में अक्सर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि आखिर बिहू को तीन अलग-अलग समय पर मनाने के पीछे क्या कारण है।
दरअसल, बिहू सीधे तौर पर कृषि और मौसम से जुड़ा हुआ त्योहार है। असम एक कृषि प्रधान राज्य है, जहां खेती और फसल चक्र का जीवन में बहुत बड़ा महत्व है। इसी कारण बिहू के तीनों रूप अलग-अलग कृषि चरणों को दर्शाते हैं।
1. रोंगाली बिहू (बैसाख बिहू)
यह बिहू अप्रैल के महीने में मनाया जाता है और इसे सबसे प्रमुख और रंगारंग माना जाता है। इसे नए साल और नई फसल के आगमन के रूप में मनाया जाता है। इस दौरान लोग नृत्य, संगीत और पारंपरिक उत्सव के जरिए खुशियां मनाते हैं। यह समय खेतों में नई शुरुआत का प्रतीक होता है।
2. कोंगाली बिहू (काति बिहू)
यह बिहू अक्टूबर के आसपास आता है। इस समय खेतों में फसल तो होती है, लेकिन घरों में अनाज की कमी होती है, इसलिए इसे “कोंगाली” यानी अभाव का बिहू कहा जाता है। इस दौरान लोग साधारण तरीके से पूजा-पाठ करते हैं और अच्छी फसल की कामना करते हैं।
3. भोगाली बिहू (माघ बिहू)
यह जनवरी में मनाया जाता है और यह फसल कटाई के बाद का त्योहार होता है। इस समय घरों में अनाज की भरपूरता होती है, इसलिए इसे “भोगाली” यानी आनंद और भोज का बिहू कहा जाता है। लोग सामूहिक दावत, खेल-कूद और अलाव के साथ इस पर्व को मनाते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, बिहू के तीनों रूप असम के लोगों के जीवन, उनकी खेती और प्रकृति के साथ उनके गहरे संबंध को दर्शाते हैं। यह केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि जीवन के तीन अलग-अलग चरणों—शुरुआत, संघर्ष और समृद्धि—का प्रतीक भी है।
कुल मिलाकर, बिहू को साल में तीन बार मनाने के पीछे मुख्य कारण असम का कृषि चक्र और मौसम में बदलाव है। यही वजह है कि यह त्योहार पूरे साल अलग-अलग रूपों में लोगों के जीवन का हिस्सा बना रहता है और उनकी संस्कृति को जीवंत बनाए रखता है।