विश्वस्तरीय शोध के लिए भारत को वैज्ञानिक बुनियादी ढांचे में निवेश बढ़ाना होगा : जोआचिम फ्रैंक
नई दिल्ली, 27 अक्टूबर (आईएएनएस)। भविष्य की तकनीक और वैज्ञानिक अनुसंधान पर वैश्विक मंथन के बीच भारत की भूमिका को लेकर कोलंबिया विश्वविद्यालय (न्यूयॉर्क) के नोबेल विजेता प्रो. जोआचिम फ्रैंक ने बड़ी टिप्पणी की है। भारत को विज्ञान और इनोवेशन के क्षेत्र में अगली बड़ी ताकत बनने के लिए किन बुनियादी जरूरतों पर ध्यान देना होगा और युवा वैज्ञानिकों को किस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए, इस पर उन्होंने अपना विजन साझा किया।
प्रो. जोआचिम फ्रैंक ने कहा, "मुझे इस उद्यम के आयामों का पता नहीं था। तकनीक के संदर्भ में भविष्य पर चर्चा करने का यह बहुत प्रभावी तरीका लगता है और मुझे इसका हिस्सा बनकर खुशी हो रही है। भारत के संदर्भ में मुझे लगता है कि यह स्पष्ट रूप से एक उपमहाद्वीप है, जहां अवसर और क्षमता बहुत अधिक हैं, खासकर मानव क्षमता। वास्तव में जिस चीज की जरूरत है, वह है हार्डवेयर तकनीक।"
उन्होंने कहा कि मेरे क्षेत्र में यह क्रायो-इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी तकनीक है। क्रायो-इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी करने के इच्छुक बहुत से लोगों के लिए केवल छह उपकरण हैं। भारत को प्रतिस्पर्धी बनने के लिए मुझे लगता है कि इनकी संख्या बढ़ाकर कम से कम 20 या उससे अधिक करनी होगी।
वैज्ञानिक अनुसंधान में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की भूमिका को लेकर उन्होंने कहा कि मैं एआई को सहायक मानता हूं, न कि प्रेरक शक्ति। मुझे लगता है कि एआई की क्षमताओं को लेकर बहुत बड़ी गलतफहमी है। इस रास्ते पर चलना बहुत खतरनाक है। मेरे और विज्ञान में प्रशिक्षित कई अन्य लोगों के लिए, विज्ञान अनुभव-आधारित है और एआई केवल सहायक भूमिका निभा सकता है। बेशक, एआई के पास बहुत बड़े डेटा-समुच्चयों से निपटने, रुझान खोजने आदि की कहीं अधिक क्षमता है, लेकिन इसकी क्षमताओं को लेकर बहुत बड़ी गलतफहमी रही है। यह स्वायत्त नहीं हो सकता और इसे स्वायत्त नहीं होना चाहिए। यह केवल सहायक भूमिका निभा सकता है।
नोबेल पुरस्कार विजेता प्रो. जोआचिम फ्रैंक ने कहा कि उदाहरण के लिए, संरचनात्मक जीवविज्ञान में एआई को प्रशिक्षण डेटा की आवश्यकता होती है। एक्स-रे क्रिस्टलोग्राफी और क्रायो-ईएम से दशकों में बहुत बड़ी मात्रा में डेटा उपलब्ध हुआ है और एआई इसी डेटा से सीखता रहा है, लेकिन अनुसंधान के ऐसे कई बड़े क्षेत्र हैं, जहां कोई डेटा उपलब्ध नहीं है। इन क्षेत्रों में एआई पूरी तरह अंधा है। यह कुछ भी उत्पन्न नहीं कर सकता, क्योंकि इसे कोई डेटा दिया ही नहीं गया है।
उन्होंने कहा कि भारत के लिए बुनियादी विज्ञान और सही उपकरणों का होना अत्यंत आवश्यक है। मैंने पहले ही संरचनात्मक जीवविज्ञान की स्थिति पर टिप्पणी की थी। एक्स-रे क्रिस्टलोग्राफी में निवेश किया गया है, लेकिन दवा विकास आदि के लिए उभरती हुई तकनीक वास्तव में क्रायो-इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी है। उपलब्ध उपकरणों की संख्या बहुत ही कम है। मूलतः यह लगभग नगण्य है। इस बेहद सीमित निवेश के साथ भारत को बराबरी पर आने में अभी लंबा समय लगेगा।
वैज्ञानिकों के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों को लेकर उन्होंने सलाह देते हुए कहा कि इंटरनेट और सोशल नेटवर्क के इस दौर में जानकारी की बाढ़ आ गई है। खासकर युवा वैज्ञानिकों के लिए सही दिशा तय करना कठिन हो जाता है। उन्हें समझ नहीं आता कि किस दिशा में आगे बढ़ें और समाज के लिए क्या महत्वपूर्ण है। मैं लोगों से आग्रह करूंगा कि वे उन समस्याओं पर ध्यान दें जिनका सामना हम दुनिया भर में कर रहे हैं, जैसे ग्लोबल वार्मिंग और निष्पक्ष विचारों और राजनीतिक परिस्थितियों से जुड़ी चुनौतियां। इन समस्याओं के समाधान में निवेश करना होगा और इसे इस तरह प्रस्तुत करना होगा कि युवा वैज्ञानिकों को आगे बढ़ने के स्पष्ट रास्ते दिखाई दें।
प्रो. फ्रैंक ने कहा कि जब मैंने वैज्ञानिक के रूप में शुरुआत की थी, तब भी दिशा को लेकर ऐसी ही उलझन थी। मुझे कोई रास्ता नहीं मिल रहा था। उस समय यह जानने के लिए पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं थी कि कहां जाना चाहिए। इंटरनेट नहीं था। लोगों को उन सम्मेलनों के सार पढ़ने के लिए सार्वजनिक पुस्तकालयों में जाना पड़ता था, जिनमें वे भाग लेते थे। इसी तरह मैंने बहुत धीरे-धीरे अपना रास्ता खोजा। आज स्थिति बिल्कुल उलट है। जानकारी की बाढ़ है, इसलिए अपना रास्ता ढूंढ़ना बहुत मुश्किल हो सकता है।
भारत के लिए विश्वस्तरीय वैज्ञानिक खोजें बढ़ाने के लिए उन्होंने कहा कि यह बेहद जरूरी है कि निवेश वहां किया जाए, जहां उसका सबसे अधिक महत्व हो। राष्ट्रीय संसाधन केंद्र स्थापित होने चाहिए, जहां लोग अपने नमूने भेज सकें। यदि हम संरचनात्मक जीवविज्ञान की बात करें, तो यह आणविक चिकित्सा के विकास के लिए वास्तव में एक बहुत महत्वपूर्ण क्षेत्र है। मेरे विचार से चिकित्सा को वास्तव में व्यक्तिगत, पूरी तरह व्यक्ति-केंद्रित उपचार की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए, क्योंकि आज दवाएं किसी काल्पनिक औसत व्यक्ति को ध्यान में रखकर विकसित की जाती हैं।
--आईएएनएस
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