विश्व बांस दिवस : सिर्फ घास नहीं, 'ग्रीन स्टील' है बांस, पर्यावरण में भी खास योगदान
नई दिल्ली, 17 सितंबर (आईएएनएस)। बांस का उपयोग घर-निर्माण से लेकर सजावट, हस्तशिल्प, औषधि और पर्यावरण संरक्षण तक अनगिनत क्षेत्रों में होता है। प्रकृति के इस लचीले, टिकाऊ और चमत्कारिक संसाधन की अपार संभावनाओं को मान्यता देने तथा वैश्विक स्तर पर इसके प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए ही प्रतिवर्ष 18 सितंबर को 'विश्व बांस दिवस' मनाया जाता है।
इस महत्वपूर्ण पहल की आधिकारिक शुरुआत 18 सितंबर 2009 को बैंकॉक (थाईलैंड) में आयोजित 8वें विश्व बांस कांग्रेस के दौरान विश्व बांस संगठन द्वारा की गई थी। समय के साथ इस दिवस का महत्व लगातार बढ़ता जा रहा है। वर्ष 2026 के लिए इस दिवस की आधिकारिक थीम 'बैम्बू बियॉन्ड बॉर्डर्स' निर्धारित की गई है, जो सीमाओं से परे इसकी वैश्विक प्रासंगिकता को दर्शाती है जबकि इससे पूर्व 2025 में इसकी थीम 'नेक्स्ट जेनरेशन बैम्बू: सॉल्यूशन, इनोवेशन, एंड डिजाइन' थी, जो आधुनिक चुनौतियों के समाधान में इसके नवाचार को रेखांकित करती है।
बांस पोएसी कुल की घास है, इसे ग्रेमिनीई भी कहा जाता है। यह सबसे लंबी और लकड़ी जैसी घास होती है। साधारण-सी घास दिखने वाला यह पौधा अपने भीतर एक अभूतपूर्व ताकत समेटे हुए है। अपनी असाधारण संरचना के कारण इसे 21वीं सदी का 'ग्रीन स्टील' कहा जाता है। इसकी तनन क्षमता इतनी ज्यादा होती है कि यह निर्माण क्षेत्र में बड़े पैमाने पर उपयोग किए जाने वाले माइल्ड स्टील से भी मुकाबला करती है या कई मामलों में उससे भी बेहतर प्रदर्शन करती है।
वैश्विक अर्थव्यवस्था में बांस की भूमिका को कम करके नहीं आंका जा सकता। अंतरराष्ट्रीय बांस और बेंत संगठन (आईएनबीएआर) और विभिन्न बाजार अनुसंधानों के आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक बांस बाजार का आकार 2025 में लगभग 70 से 76 बिलियन डॉलर आंका गया था। अनुमान है कि यह वर्ष 2033 तक 113.8 बिलियन डॉलर के विशाल आंकड़े को पार कर जाएगा। इस विस्तृत वैश्विक व्यापार में चीन 30 मिलियन टन वार्षिक उत्पादन और 2 बिलियन डॉलर से अधिक के निर्यात मूल्य के साथ अग्रणी है जिसके ठीक बाद 20 मिलियन टन उत्पादन के साथ भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा केंद्र है।
पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन के खिलाफ चल रही वैश्विक लड़ाई में बांस एक अत्यंत शक्तिशाली प्राकृतिक अस्त्र है। अपनी तीव्र वृद्धि दर के कारण, एक हेक्टेयर बांस का जंगल प्रति वर्ष लगभग 12,000 से 17,000 किलोग्राम कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करने की क्षमता रखता है।
इसके अतिरिक्त, यह सामान्य पेड़ों की तुलना में बहुत तेजी से पर्यावरण में ऑक्सीजन छोड़ता है और अपने तनों, पत्तियों तथा जड़ों में भारी मात्रा में कार्बन को संग्रहित करता है। पर्यावरण को शुद्ध करने में इसकी भूमिका केवल हवा तक सीमित नहीं है बल्कि यह फाइटोरेमेडिएशन की प्रक्रिया के माध्यम से भारी धातुओं से प्रदूषित मिट्टी को भी पुनर्जीवित करता है। अध्ययनों से यह सिद्ध हुआ है कि विशेष रूप से 'मोसो बांस' और अन्य प्रजातियां अपनी जड़ों के माध्यम से जिंक, क्रोमियम जैसे विषाक्त तत्वों और यहां तक कि कच्चे तेल के रिसाव को सोखकर भूमि को दोबारा उपजाऊ बनाने में अत्यधिक कारगर हैं।
--आईएएनएस
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