विधानसभा में हंगामा निंदनीय, सपा-कांग्रेस असंवैधानिक तरीके से कार्यवाही कर रही बाधित: अयोध्या के संत
अयोध्या, 4 अगस्त (आईएएनएस)। उत्तर प्रदेश विधानसभा की कार्यवाही के दौरान समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के हंगामे पर अयोध्या के संतों और धार्मिक नेताओं ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि सदन में जनता के मुद्दों पर चर्चा के बजाय विपक्ष लगातार व्यवधान पैदा कर रहा है, और इससे लोकतांत्रिक परंपराओं को नुकसान पहुंच रहा है।
साकेत भवन के महंत सीताराम दास ने आईएएनएस से बात करते हुए कहा, "जिस तरह से समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के सदस्यों ने विधानसभा की कार्यवाही में बाधा डाली, वह निंदनीय है। सत्ता पक्ष लगातार उनसे बातचीत करने और संवैधानिक नियमों का पालन करने का आग्रह करता रहा, लेकिन विपक्ष ने उसे नजरअंदाज किया। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के सदस्य असंवैधानिक तरीके से व्यवहार कर रहे हैं। वे न तो संविधान में विश्वास रखते हैं और न ही इसके तहत स्थापित संस्थाओं की गरिमा और पवित्रता को समझते हैं। ऐसी दूषित मानसिकता वाले लोग सदन में जनता की चिंताओं और समस्याओं को उठाने के बजाय लगातार व्यवधान पैदा करते हैं। इससे आम जनता का भरोसा लोकतांत्रिक संस्थाओं से उठता है।"
अयोध्या के महामंडलेश्वर विष्णु दास महाराज ने कहा कि जो लोग अपने परिवार को ही नहीं संभाल पा रहे हैं, वे सदन को कैसे चलने देंगे। उन्होंने समाजवादी पार्टी के भीतर चाचा और भतीजे के बीच चल रही आपसी कलह का जिक्र करते हुए कहा कि इसी कारण सदन में भी नौटंकी हो रही है। उन्होंने कहा, "विपक्ष के सदस्य सदन के अंदर भी ड्रामा करते हैं और केवल बेतुकी बातें करते हैं। राम मंदिर, चढ़ावे और चोरी जैसे मुद्दों को बार-बार उठाकर सदन का समय बर्बाद किया जा रहा है।"
महामंडलेश्वर ने सुझाव दिया कि विपक्ष की इस नौटंकी को देखते हुए उन्हें सदन में प्रवेश की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए, ताकि सदन सुचारू रूप से चल सके और जनता से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हो सके।
धार्मिक नेता करपात्री महाराज ने कहा, "जब समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और अन्य विपक्षी विधायक देश को चलने नहीं दे रहे हैं तो वे विधानसभा को कैसे चलने देंगे? जो लोग देश की प्रगति में बाधा बनते हैं, वे राज्य की विधानसभा में अनुशासन की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?"
करपात्री महाराज ने मांग की, "इस तरह के हंगामे को रोकने के लिए एक कानून बनाया जाना चाहिए। इसके तहत सदन चलाने में होने वाले खर्च की पूरी लागत, जो करोड़ों रुपए में होती है, उन लोगों से वसूली जाए जो सदन को स्थगित करने या व्यवधान पैदा करने के लिए जिम्मेदार हैं।"
--आईएएनएस
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