उत्तरकाशी: कल्पकेदार मंदिर के अस्तित्व को बचाने के लिए ग्रामीणों ने शुरू की खुदाई
देहरादून, 13 अक्टूबर (आईएएनएस)। उत्तरकाशी के धराली में 5 अगस्त 2025 को खीर गंगा में आई भीषण बाढ़ और मलबे के प्रवाह में दबे प्राचीन कल्पकेदार मंदिर को फिर से बाहर निकालने की उम्मीद जगी है। मंदिर के अस्तित्व को बचाने के लिए स्थानीय ग्रामीणों ने खुदाई का कार्य शुरू कर दिया है।
शारदीय नवरात्र के पहले दिन प्राचीन कल्पकेदार मंदिर समिति और ग्रामीणों ने रविवार को क्षेत्र के आराध्य सोमेश्वर देवता की डोली की मौजूदगी में हवन-पूजन और भूमि पूजन किया। इसके बाद मंदिर को मलबे से बाहर निकालने के लिए खुदाई शुरू करवाई गई। ग्रामीणों की यह पहल केवल एक प्राचीन मंदिर को सामने लाने का प्रयास नहीं, बल्कि धराली की धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत को बचाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, धराली क्षेत्र में कभी लगभग 240 मंदिरों का समूह हुआ करता था, जिसमें कल्पकेदार मंदिर प्रमुख स्थान रखता था। भगवान शिव को समर्पित यह प्राचीन मंदिर चारधाम यात्रा पर आने वाले श्रद्धालुओं के लिए भी महत्वपूर्ण धार्मिक पड़ाव माना जाता रहा है। मंदिर से क्षेत्र की पुरानी धार्मिक परंपराएं, ऐतिहासिक मान्यताएं और स्थानीय जनश्रुतियां जुड़ी हुई हैं। यही वजह है कि मंदिर के मलबे में दबने के बाद से ग्रामीण इसकी मूल संरचना और अवशेषों को सुरक्षित बाहर निकालने की उम्मीद लगाए हुए हैं।
पांच अगस्त 2025 को खीर गंगा में आई विनाशकारी बाढ़ ने धराली में भारी तबाही मचाई थी। इस आपदा में बड़ी मात्रा में मलबा आने से प्राचीन कल्पकेदार मंदिर पूरी तरह दब गया। स्थानीय लोगों के अनुसार, मंदिर को पहले भी कई बार मलबे से नुकसान पहुंचा था, लेकिन ग्रामीणों के प्रयासों से हर बार इसे बाहर निकालने और इसकी धार्मिक पहचान को बचाए रखने की कोशिश की जाती रही। इस बार मलबे की अधिकता के कारण मंदिर को बाहर निकालने का कार्य चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।
प्राचीन कल्पकेदार मंदिर समिति के अध्यक्ष राजेश पंवार और सचिव संजय पंवार के अनुसार, आपदा की पहली बरसी पर पांच अगस्त को ग्रामीणों ने क्षेत्र के आराध्य देवता सोमेश्वर से मंदिर की खुदाई की अनुमति मांगी थी। इसके बाद नवरात्र के पहले दिन देवडोली की मौजूदगी में धार्मिक अनुष्ठान कर खुदाई कार्य शुरू करवाया गया। समिति पदाधिकारियों ने बताया कि प्रदेश सरकार की ओर से भी पहले मंदिर को मलबे से बाहर निकालने का आश्वासन दिया गया था, लेकिन उनके अनुसार इस दिशा में अपेक्षित कार्रवाई नहीं हो सकी। ऐसे में ग्रामीणों ने अपने स्तर पर पहल करते हुए खुदाई शुरू कराने का निर्णय लिया।
मंदिर को बाहर निकालने के लिए एक्सकेवेटर मशीन से प्रतिदिन लगभग आठ घंटे खुदाई किए जाने की योजना है। इस कार्य पर प्रतिदिन करीब 40 हजार रुपए खर्च होने का अनुमान है। मंदिर समिति और ग्रामीणों के सामने सबसे बड़ी चुनौती मलबे की मोटी परत के नीचे दबे प्राचीन मंदिर के अवशेषों तक सुरक्षित पहुंचना है। ग्रामीणों को उम्मीद है कि व्यवस्थित खोदाई के दौरान मंदिर की मूल संरचना, प्रवेश द्वार, शिवलिंग अथवा स्थापत्य से जुड़े अन्य अवशेष सामने आ सकते हैं। हालांकि, मंदिर की वास्तविक स्थिति का पता खुदाई आगे बढ़ने के बाद ही चल सकेगा।
कल्पकेदार मंदिर का महत्व केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है। स्थानीय मान्यताओं में इसे धराली की प्राचीन सांस्कृतिक पहचान और हिमालयी शिव उपासना की परंपरा से जोड़कर देखा जाता है। मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथाएं और पीढ़ियों से चली आ रही मान्यताएं क्षेत्र के सामाजिक जीवन का हिस्सा रही हैं। ऐसे में मंदिर के अवशेषों का सुरक्षित बाहर आना धराली के इतिहास और धार्मिक विरासत को समझने का महत्वपूर्ण अवसर हो सकता है। इसके लिए पुरातत्व विशेषज्ञों की निगरानी में अवशेषों का संरक्षण और ऐतिहासिक साक्ष्यों का अध्ययन भी जरूरी होगा।
मंदिर समिति के कोषाध्यक्ष विपेंद्र पंवार, ग्राम प्रधान अजय नेगी, युवक मंगल दल के अध्यक्ष शुभम पंवार सहित महिला मंगल दल और कीर्तन मंडली के सदस्य इस पहल से जुड़े रहे। ग्रामीणों की सामूहिक भागीदारी से मंदिर को फिर से सामने लाने की उम्मीद मजबूत हुई है।
नवरात्र के इसी धार्मिक वातावरण में धराली के ग्रामीणों ने प्राचीन कल्पकेदार मंदिर को पुनः बाहर निकालने के लिए खुदाई शुरू कर अपनी आस्था और विरासत के संरक्षण का संकल्प दोहराया।
--आईएएनएस
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