उत्तराखंड के जैनासर का वो मंदिर जहां युधिष्ठिर ने की थी शिवलिंग की स्थापना
उत्तराखंड, 28 सितंबर (आईएएनएस)। देवभूमि उत्तराखंड का कण-कण शिवमय है। देहरादून से करीब 128 किलोमीटर दूर जैनासर-बावर क्षेत्र में स्थित है रहस्य और इतिहास से भरा लाखामंडल मंदिर एक पौराणिक शिव मंदिर है, जहां पांडवों को जलाने के लिए कौरवों ने लाक्षागृह बनवाया था।
इस मंदिर का मुख्य आकर्षण यहां स्थापित शिवलिंग है, जिस पर जल अर्पित करने पर वह चमकने लगता है और अपनी परछाई में व्यक्ति का प्रतिबिंब दिखाता है।अपनी पौराणिक कथाओं, अनोखी शिवलिंग और प्राकृतिक सुंदरता के कारण लाखामंडल मंदिर आज भी श्रद्धालुओं और इतिहास प्रेमियों के लिए आस्था और जिज्ञासा का केंद्र बना हुआ है।
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मंदिर की प्रशंसा करने के साथ लाखामंडल मंदिर के दर्शन के लिए भी कहा है। उनका मानना है कि श्रद्धालुओ को मंदिर के दर्शन के लिए जरूर आना चाहिए।
'लाखामंडल' नाम 'लाख' (एक लाख) और 'मंडल' (शिवलिंग/मंदिर) से बना है। यहां भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की खुदाई में हजारों/लाखों प्राचीन शिवलिंग और दुर्लभ मूर्तियां मिल चुकी हैं।
मंदिर को लेकर ऐसी मान्यता है कि यहां पर द्वापर युग में अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने माता कुंती के साथ यहां निवास किया था और धर्मराज युधिष्ठिर ने यहां मुख्य शिवलिंग की स्थापना की थी, जिसे 'महामंडलेश्वर' कहा जाता है। दुर्योधन ने पांडवों के बारे में पता चलने पर यहां पांडवों को जीवित जलाने के लिए लाख का एक महल (लाक्षागृह) बनवाया था। विदुर की नीति और एक गुप्त सुरंग की मदद से पांडव वहां से सुरक्षित बाहर निकल आए थे
ऐसी लोकमान्यता है कि मंदिर के द्वारपालों (मानव व दानव जैसी दिखने वाली मूर्तियां) बनी हैं, जिनके सामने यदि किसी मृत व्यक्ति के शव को रखा जाए और पुजारी उस पर पवित्र जल छिड़क दे, तो वह कुछ पलों के लिए जीवित हो उठता है। गंगाजल ग्रहण करने के बाद उसकी आत्मा पुनः शरीर त्याग देती है। हालांकि, आधुनिक समय में यह प्रथा बंद हो चुकी है।
यहां 6वीं शताब्दी ईस्वी का एक प्राचीन पाषाण शिलालेख मिला है, जिसके अनुसार सिंहपुर की राजकुमारी 'ईश्वररा' ने अपने मृत पति चंद्रगुप्त (जालंधर के राजा के पुत्र) की आत्मिक शांति और कल्याण के लिए इस शिव मंदिर का निर्माण करवाया था।
--आईएएनएस
एनएस/पीएम