☰
×

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा बयान: इंटरनेट इस्तेमाल करना बच्चों का भी मौलिक अधिकार, वीडियो में जाने गलत कंटेंट के नाम पर पूरी तरह बैन करना समाधान नहीं

 

सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के इंटरनेट इस्तेमाल को लेकर अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि इंटरनेट तक पहुंच हर व्यक्ति, यहां तक कि हर उम्र के बच्चे का भी मौलिक अधिकार है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्चों को ऑनलाइन गलत सामग्री से बचाने के नाम पर उन्हें इंटरनेट से पूरी तरह दूर रखना उचित समाधान नहीं है। बच्चों की सुरक्षा और उनकी आजादी एक-दूसरे के विरोध में नहीं हैं, बल्कि उन्हें दोनों का अधिकार है। अदालत ने यह भी चेताया कि इंटरनेट पर अनुचित सामग्री मौजूद होने के कारण बच्चों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने से वे कम सुरक्षित वेबसाइटों और प्लेटफॉर्म की ओर जा सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने ये टिप्पणियां बच्चों के यौन शोषण से जुड़े कंटेंट को इंटरनेट से हटाने की व्यवस्था मजबूत करने से संबंधित मामले की सुनवाई के दौरान कीं।

बच्चों को इंटरनेट से पूरी तरह दूर रखना समाधान नहीं

<a style="border: 0px; overflow: hidden" href=https://youtube.com/embed/Q2Ro0jABbhg?autoplay=1&mute=1><img src=https://img.youtube.com/vi/Q2Ro0jABbhg/hqdefault.jpg alt=""><span><div class="youtube_play"></div></span></a>" style="border: 0px; overflow: hidden;" width="640">

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि इंटरनेट पर गलत कंटेंट की मौजूदगी के कारण बच्चों को इससे पूरी तरह दूर रखना बेतुका होगा। बच्चों को डिजिटल दुनिया से अलग करने के बजाय ऐसा माहौल तैयार करने की जरूरत है, जिसमें वे सुरक्षित रहते हुए इंटरनेट का इस्तेमाल कर सकें।अदालत के मुताबिक, बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करना जरूरी है, लेकिन इसके लिए उनकी ऑनलाइन पहुंच पूरी तरह बंद कर देना सही रास्ता नहीं है। इंटरनेट शिक्षा, जानकारी और संवाद का महत्वपूर्ण माध्यम है। ऐसे में बच्चों के हितों की रक्षा करते हुए उनकी स्वतंत्रता को भी ध्यान में रखना होगा।

पाबंदियों से बच्चे कम सुरक्षित प्लेटफॉर्म पर जा सकते हैं

सुप्रीम कोर्ट ने आगाह किया कि इंटरनेट पर गलत सामग्री होने के कारण बच्चों पर अत्यधिक पाबंदियां लगाने के अनचाहे परिणाम हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में बच्चे कम सुरक्षित वेबसाइटों और डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करने लग सकते हैं, जहां उनकी सुरक्षा को ज्यादा खतरा हो सकता है।अदालत ने यह भी कहा कि ऑनलाइन धमकी, उत्पीड़न या शोषण का सामना करने वाले बच्चे शिकायत करने से डर सकते हैं। यदि उन्हें लगे कि शिकायत करने के बाद इंटरनेट इस्तेमाल करने पर ही रोक लगा दी जाएगी, तो वे अपनी परेशानी सामने लाने से बच सकते हैं।इसलिए बच्चों की सुरक्षा के लिए ऐसा तंत्र जरूरी है, जिसमें वे बिना डर के अपनी शिकायत दर्ज करा सकें और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई हो सके।

बच्चों के यौन शोषण से जुड़े कंटेंट पर सख्ती

सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के यौन शोषण से संबंधित सामग्री को इंटरनेट से हटाने की व्यवस्था मजबूत करने के लिए केंद्र सरकार को कई निर्देश दिए हैं। इसका उद्देश्य ऐसी सामग्री की पहचान करना, उसके प्रसार को रोकना और संबंधित डिजिटल प्लेटफॉर्म की जवाबदेही तय करना है।अदालत ने केंद्र सरकार को ऐसे कंटेंट का राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार करने का निर्देश दिया है। इस डेटाबेस में प्रमाणित आपत्तिजनक सामग्री की डिजिटल पहचान और उन वेबसाइटों के लिंक दर्ज किए जाएंगे, जहां ऐसी सामग्री उपलब्ध है।

नेशनल डेटाबेस में हैश और वेबसाइट लिंक होंगे शामिल

अदालत के निर्देश के अनुसार, प्रस्तावित डेटाबेस में बच्चों के यौन शोषण से जुड़े प्रमाणित कंटेंट का डिजिटल हैश और संबंधित वेबसाइटों के लिंक रखे जाएंगे। हैश डिजिटल सामग्री की पहचान करने वाला एक विशिष्ट कोड होता है, जिसकी मदद से किसी सामग्री की पहचान और मिलान करने में सहायता मिल सकती है।इस डेटाबेस को मौजूदा सहयोग पोर्टल पर तैयार किया जा सकता है या इसके लिए अलग व्यवस्था बनाई जा सकती है। इससे संबंधित एजेंसियों और डिजिटल प्लेटफॉर्म को ऐसी सामग्री की पहचान करने तथा उसे हटाने में मदद मिलने की उम्मीद है।

सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही पर जोर

सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया कंपनियों को लेकर भी निर्देश दिए हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, कंपनियों को बच्चों के यौन शोषण से संबंधित सामग्री की जानकारी मिलने पर दो घंटे के भीतर पुलिस को रिपोर्ट करने की व्यवस्था के निर्देश दिए गए हैं।इसका उद्देश्य ऐसे मामलों में त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित करना और आपत्तिजनक सामग्री के प्रसार को रोकना है। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बच्चों की सुरक्षा को लेकर कंपनियों की जिम्मेदारी महत्वपूर्ण मानी गई है।सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों से स्पष्ट है कि बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए केवल प्रतिबंध लगाना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए प्रभावी निगरानी, शिकायत दर्ज कराने की सुरक्षित व्यवस्था, आपत्तिजनक सामग्री को हटाने की प्रक्रिया और सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही मजबूत करना जरूरी है।