त्रिकूट पर्वत की गुफा में विराजते हैं त्रिकुटेश्वर महादेव, प्रकृति करती है शिव का अनवरत जलाभिषेक
भागलपुर, 20 अगस्त (आईएएनएस)। झारखंड के देवघर से करीब 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित त्रिकूट पर्वत धार्मिक आस्था, प्राकृतिक सौंदर्य और लोकविश्वास का अनूठा संगम है। तीन ऊंची चोटियों वाला यह पर्वत दूर से ही श्रद्धालुओं और पर्यटकों को आकर्षित करता है। यहां की गुफाएं, शिलाखंड, मंदिर और उनसे जुड़ी मान्यताएं इस क्षेत्र को झारखंड के प्रमुख धार्मिक एवं पर्यटन स्थलों में विशेष स्थान दिलाती हैं।
त्रिकूट की तीन चोटियों को स्थानीय परंपरा में ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक माना जाता है। यही वजह है कि पर्वत का धार्मिक महत्व केवल एक तीर्थ स्थल तक सीमित नहीं है। यहां प्रकृति के विभिन्न स्वरूपों को भी आध्यात्मिक दृष्टि से देखा जाता है। सुबह की धूप में चमकती चोटियां हों या बारिश के मौसम में बादलों से घिरा पर्वत, हर मौसम में त्रिकूट का अलग रूप दिखाई देता है। इस पर्वत की सबसे खास पहचान प्राकृतिक गुफा में विराजमान त्रिकुटेश्वर महादेव हैं। गुफा के भीतर स्थापित शिवलिंग पर चट्टानों से लगातार पानी की बूंदें गिरती रहती हैं।
श्रद्धालु इसे भगवान शिव का प्राकृतिक जलाभिषेक मानते हैं। गुफा में प्रवेश करते ही बाहर के वातावरण से बिल्कुल अलग शांति का अनुभव होता है। पानी की बूंदों की आवाज और गुफा की प्राकृतिक संरचना इसे आध्यात्मिक अनुभूति का केंद्र बना देती है। त्रिकूट पर्वत से रावण और भगवान शिव से जुड़ी कई लोककथाएं भी प्रचलित हैं।
स्थानीय मान्यता के अनुसार, रावण ने यहां भगवान शिव की आराधना और तपस्या की थी। पर्वत की तराई में स्थित त्रिकुटेश्वरनाथ मंदिर को लेकर भी ऐसी ही मान्यता सुनने को मिलती है कि इसका संबंध रावण की शिवभक्ति से रहा है। हालांकि इन कथाओं का ऐतिहासिक प्रमाण एक अलग विषय है, लेकिन स्थानीय संस्कृति और धार्मिक परंपरा में इनका गहरा प्रभाव आज भी देखा जा सकता है। त्रिकूट से जुड़ी एक अन्य लोकमान्यता माता सीता के दीप से संबंधित है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यहां सीता द्वारा प्रज्वलित किया गया दीप आज भी सुरक्षित है।
इसी तरह पर्वत की ऊंचाई पर स्थित एक विशाल शिलाखंड को स्थानीय लोग 'विष्णु टॉप' कहते हैं और इसे शालिग्राम स्वरूप से जोड़कर देखते हैं। शिलाखंड के नीचे बने संकरे रास्ते से निकलने को लेकर भी कई तरह की धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। पर्वत पर प्राकृतिक रूप से बनी कई चट्टानें अलग-अलग आकृतियों का आभास कराती हैं। हाथी जैसी विशाल चट्टान को ‘हाथी पहाड़’ कहा जाता है, जबकि एक अन्य शिला को शेषनाग के स्वरूप से जोड़ा जाता है। इन प्राकृतिक संरचनाओं में लोगों को धार्मिक प्रतीकों की झलक दिखाई देती है।
धार्मिक महत्व के साथ त्रिकूट आज पर्यटन के लिहाज से भी बेहद लोकप्रिय है। करीब 1,282 फीट की ऊंचाई तक पहुंचाने वाला रोपवे पर्यटकों के लिए प्रमुख आकर्षण है। लगभग आठ मिनट की इस यात्रा में नीचे फैले जंगल, खेत और देवघर का प्राकृतिक परिदृश्य मन मोह लेता है। त्रिकूट पर्वत स्थानीय लोगों की आजीविका का भी महत्वपूर्ण आधार है। तीर्थयात्रियों और पर्यटकों की आवाजाही से परिवहन, स्थानीय भोजन, हस्तशिल्प और छोटे कारोबार को लाभ मिलता है।
हालांकि बढ़ते पर्यटन के बीच पर्वत की प्राकृतिक संपदा को सुरक्षित रखना भी जरूरी है। गुफाओं, जलस्रोतों, वन क्षेत्र और प्राकृतिक शिलाओं का संरक्षण किए बिना इस विरासत को लंबे समय तक सुरक्षित नहीं रखा जा सकता। त्रिकूट की खासियत यही है कि यहां धर्म और प्रकृति अलग-अलग दिखाई नहीं देते। गुफा में शिवलिंग पर गिरती पानी की बूंदें, पर्वत की शांत ऊंचाइयां और सदियों से चली आ रही लोककथाएं मिलकर ऐसा वातावरण बनाती हैं, जहां श्रद्धालु केवल दर्शन नहीं करता, बल्कि प्रकृति और आस्था के बीच एक गहरा संबंध महसूस करता है। यही त्रिकूट पर्वत की सबसे बड़ी पहचान है।
--आईएएनएस
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