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SC/ST एक्ट के प्रावधानों को चुनौती पर सुप्रीम कोर्ट ने नहीं की सुनवाई, जानिए क्या है पूरा मामला
 

 

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के कुछ प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से इनकार कर दिया। याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई थी कि अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को अत्याचार से सुरक्षा देने के लिए बनाए गए कानून के कुछ प्रावधानों के दुरुपयोग की आशंका है और इससे आरोपियों के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने याचिका पर विचार करने से इनकार करते हुए कहा कि आरोपियों के हितों की सुरक्षा के लिए कानून में पर्याप्त उपाय मौजूद हैं। पीठ ने यह भी ध्यान दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट वर्ष 2020 में इस कानून की वैधता को बरकरार रख चुका है।


याचिकाकर्ता ने गिरफ्तारी और FIR की प्रक्रिया पर उठाए सवाल
याचिकाकर्ता बृजभूषण सैनी की ओर से पेश हुए वकील विष्णु शंकर जैन ने दलील दी कि इस कानून के तहत शुरुआती जांच के बिना FIR दर्ज किए जाने और आरोपी की गिरफ्तारी की व्यवस्था पर पुनर्विचार की जरूरत है।
वकील ने कहा कि ऐसी प्रक्रिया से कानून के दुरुपयोग की संभावना पैदा हो सकती है। उन्होंने SC/ST एक्ट की धारा 18 का भी उल्लेख किया, जिसके तहत कुछ परिस्थितियों में अग्रिम जमानत का प्रावधान लागू नहीं होता।
मुआवजे की व्यवस्था का भी किया जिक्र
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से शिकायतकर्ता को मुकदमे के शुरुआती चरण में मुआवजा दिए जाने की व्यवस्था पर भी सवाल उठाया गया। दलील में राज्यसभा में दी गई जानकारी का हवाला देते हुए कहा गया कि सरकार की ओर से शिकायतकर्ताओं को बड़ी राशि का भुगतान किया गया है।
इस पर पीठ के सदस्य जस्टिस जोयमाल्या बागची ने इस दलील को रोकते हुए इसे 'क्रूर' टिप्पणी बताया। अदालत ने मामले में आगे सुनवाई करने से इनकार कर दिया।


2018 में भी SC/ST एक्ट को लेकर आया था फैसला
SC/ST एक्ट के प्रावधानों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में पहले भी सुनवाई हो चुकी है। वर्ष 2018 में सुभाष काशीनाथ महाजन मामले में अदालत ने गिरफ्तारी और FIR से पहले कुछ सुरक्षा उपायों की बात कही थी। इनमें कुछ मामलों में गिरफ्तारी से पहले मंजूरी और FIR से पहले DSP स्तर के अधिकारी से प्रारंभिक जांच जैसे प्रावधान शामिल थे।
इस फैसले के बाद व्यापक विरोध हुआ। इसके बाद संसद ने कानून में संशोधन करते हुए धारा 18A जोड़ी। संशोधन में स्पष्ट किया गया कि FIR दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच जरूरी नहीं होगी और गिरफ्तारी के लिए किसी पूर्व मंजूरी की आवश्यकता नहीं होगी।
2020 के फैसले का दिया हवाला
सुप्रीम कोर्ट ने 2020 में SC/ST एक्ट में किए गए इन बदलावों को बरकरार रखा था। मौजूदा मामले की सुनवाई के दौरान पीठ ने इसी पुराने फैसले का हवाला दिया। अदालत ने कहा कि करीब छह साल बाद उस फैसले पर दोबारा विचार करने का पर्याप्त आधार दिखाई नहीं देता।
इस तरह सुप्रीम कोर्ट ने मौजूदा याचिका पर सुनवाई आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया और SC/ST एक्ट के संबंधित प्रावधानों को लेकर 2020 में दिए गए अपने फैसले को बरकरार रखा।