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देश में कामकाजी महिलाओं की संख्या 8 साल में दोगुनी, 20 करोड़ के पार पहुंचा आंकड़ा; नौकरी के साथ घर की जिम्मेदारी भी

 

भारत में कामकाजी महिलाओं की संख्या पिछले आठ साल में लगभग दोगुनी हो गई है। अब देश में 15 साल और उससे अधिक उम्र की करीब 20 करोड़ महिलाएं रोजगार से जुड़ी हुई हैं। महिलाओं की बढ़ती आर्थिक भागीदारी को देश के श्रम बाजार में बड़े बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि, इस बदलाव के साथ महिलाओं की जिंदगी पहले से आसान नहीं हुई है। नौकरी या कारोबार के साथ घर और परिवार की जिम्मेदारियां भी बड़ी चुनौती बनी हुई हैं।

सरकार के पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) के आंकड़ों के अनुसार, 2017-18 में महिलाओं का वर्कर पॉपुलेशन रेशियो (WPR) 22 प्रतिशत था, जो 2025 में बढ़कर 38.8 प्रतिशत हो गया। वहीं, महिला श्रमबल भागीदारी दर (LFPR) 23.3 प्रतिशत से बढ़कर 40 प्रतिशत पहुंच गई। वर्ष 2025 में देश में रोजगार से जुड़ी महिलाओं की अनुमानित संख्या करीब 20 करोड़ रही।

कामकाजी महिलाओं पर दोहरी जिम्मेदारी

महिलाओं के रोजगार में बढ़ोतरी के बावजूद घरेलू जिम्मेदारियों का बोझ कम नहीं हुआ है। कई महिलाओं को ऑफिस या कामकाज से लौटने के बाद खाना बनाने, सफाई करने, बच्चों की देखभाल और बुजुर्गों की जिम्मेदारी भी निभानी पड़ती है। इस तरह उनके लिए काम का दिन घर लौटने के बाद भी खत्म नहीं होता।

ICRIER की 2026 में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, 2024 के टाइम यूज सर्वे के आंकड़ों में महिलाएं रोजाना औसतन 320 मिनट घरेलू कामों में लगाती हैं, जबकि पुरुषों का औसत 97 मिनट है। बच्चों, बुजुर्गों और परिवार के अन्य सदस्यों की देखभाल में महिलाएं औसतन 144 मिनट और पुरुष 81 मिनट खर्च करते हैं। यानी घरेलू काम और देखभाल की जिम्मेदारियों में महिलाओं का समय पुरुषों की तुलना में काफी अधिक है।

60 प्रतिशत महिलाएं घरेलू जिम्मेदारियों के कारण काम से दूर

रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में श्रमबल से बाहर रहने वाली करीब 60 प्रतिशत महिलाओं ने घरेलू जिम्मेदारियों और बच्चों की देखभाल को इसकी प्रमुख वजह बताया। इससे साफ होता है कि रोजगार के अवसर बढ़ने के बावजूद घर की जिम्मेदारियां महिलाओं के कामकाजी जीवन को प्रभावित कर रही हैं।

रोजगार की संख्या के साथ काम की गुणवत्ता भी जरूरी

महिलाओं की बढ़ती भागीदारी के साथ यह सवाल भी महत्वपूर्ण हो गया है कि उन्हें किस तरह का रोजगार मिल रहा है। रोजगार की संख्या बढ़ना आर्थिक भागीदारी का संकेत है, लेकिन नियमित वेतन, नौकरी की सुरक्षा, बेहतर आय और कामकाजी माहौल भी उतने ही जरूरी हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, महिलाओं पर घरेलू जिम्मेदारियों का बोझ कम करने के लिए परिवार में काम का समान बंटवारा, बच्चों की देखभाल की बेहतर सुविधाएं और सुरक्षित कार्यस्थल जरूरी हैं। महिलाओं की आर्थिक भागीदारी तभी मजबूत होगी, जब उन्हें रोजगार के साथ अपने निजी जीवन और परिवार के लिए भी पर्याप्त समय मिल सके।