कमजोर मानसून का असर, खेती से बिजली तक बढ़ी चिंता; जलाशयों में घटा पानी
इस साल मानसून के दौरान सामान्य से 12.6% कम बारिश होने के कारण देश के कई हिस्सों में कृषि और बिजली उत्पादन पर दबाव बढ़ गया है। दक्षिण और पूर्वी भारत के कई क्षेत्रों में कम वर्षा से खरीफ की फसलों को नुकसान पहुंचा है। महाराष्ट्र के 305 और कर्नाटक के 217 तालुकों को सूखाग्रस्त घोषित किया गया है। अब रबी की बुआई पर भी इसका असर दिखाई दे रहा है। 16 अक्टूबर तक रबी फसलों की बुआई पिछले साल की तुलना में 26% पीछे बताई गई।
कम बारिश का प्रभाव जलाशयों के जलस्तर पर भी पड़ा है। केंद्रीय जल आयोग (CWC) के आंकड़ों के अनुसार, 22 अक्टूबर को देश के 178 प्रमुख जलाशयों में उनकी कुल भंडारण क्षमता का 66.70% पानी उपलब्ध था। यह स्थिति सिंचाई, पेयजल आपूर्ति और बिजली उत्पादन के लिए चिंता बढ़ा सकती है।
धान का रकबा घटा, खाद्यान्न उत्पादन लक्ष्य में भी कमी
कम बारिश का असर खरीफ फसलों की बुआई पर पड़ा है। खरीफ का कुल रकबा पिछले साल के 1,118.9 लाख हेक्टेयर से घटकर 1,103.9 लाख हेक्टेयर रह गया। धान की बुआई के क्षेत्र में 4% और मक्का के रकबे में 3% की गिरावट दर्ज की गई।
केंद्र सरकार ने वर्ष 2026-27 के लिए खाद्यान्न उत्पादन का लक्ष्य 37 करोड़ 39 लाख 30 हजार टन रखा है। यह पिछले वर्ष के वास्तविक उत्पादन से 26.30 लाख टन कम है। बारिश की कमी और सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता में गिरावट से आने वाले समय में कृषि उत्पादन पर दबाव बना रह सकता है।
बिजली उत्पादन पर असर, सर्दियों में कटौती की आशंका
कम बारिश के कारण जलविद्युत उत्पादन प्रभावित हुआ है। सितंबर में पनबिजली उत्पादन में करीब 20% की गिरावट बताई गई। इससे बिजली की मांग बढ़ने के दौरान आपूर्ति बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
दूसरी ओर, बिजली की मांग पूरी करने के लिए थर्मल पावर प्लांटों पर निर्भरता बढ़ रही है। सितंबर में थर्मल प्लांटों का उत्पादन 13.3% बढ़ा। हालांकि, कोयले के भंडार में गिरावट ने चिंता बढ़ा दी है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल से सितंबर के बीच कोयला भंडार में 66% की कमी आई और 96 बिजली संयंत्रों में तीन दिन से कम का कोयला बचा था।
यदि मांग के मुकाबले बिजली की उपलब्धता कम रहती है, तो सर्दियों के दौरान कुछ क्षेत्रों में बिजली कटौती की स्थिति बन सकती है। बिजली की कीमतों पर भी दबाव पड़ने की आशंका है।
जलाशयों में पानी कम, दक्षिण भारत की स्थिति चिंताजनक
केंद्रीय जल आयोग के आंकड़ों के अनुसार, 22 अक्टूबर को देश के 178 प्रमुख जलाशयों में कुल क्षमता का 66.70% पानी था। यह पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 26.44% और पिछले 10 वर्षों के औसत से 18.43% कम बताया गया।
दक्षिण भारत के जलाशयों में पानी का स्तर विशेष रूप से कम है। यहां कुल क्षमता का केवल 42.34% पानी उपलब्ध बताया गया। इसके अलावा, पनबिजली उत्पादन से जुड़े 20 जलाशयों में से 12 में जलस्तर सामान्य स्तर पर या उससे नीचे है।
पानी की उपलब्धता घटने से खेती के लिए सिंचाई, शहरों में पेयजल आपूर्ति और बिजली उत्पादन प्रभावित हो सकते हैं। इसका असर किसानों के साथ-साथ आम लोगों पर भी पड़ सकता है।
सूखे से निपटने के लिए सरकार की तैयारी
कम बारिश और संभावित अल-नीनो प्रभाव को देखते हुए कृषि योजनाओं पर भी काम किया जा रहा है। जानकारी के अनुसार, 262 जिलों की कृषि योजनाओं को अपडेट किया गया है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने कृषि विज्ञान केंद्रों के लिए अल-नीनो की स्थिति से निपटने संबंधी दिशा-निर्देश जारी किए हैं।
इसके तहत बारिश, जलाशयों के जलस्तर, फसलों की बुआई और खाद-बीज की उपलब्धता की साप्ताहिक निगरानी की जा रही है। वहीं, 112 थर्मल पावर प्लांटों को अधिकतम उत्पादन बनाए रखने और पर्याप्त कोयला भंडार सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं।
आगे क्या होगा?
कम बारिश का असर केवल खरीफ फसलों तक सीमित नहीं है। रबी की बुआई, सिंचाई, जलाशयों में पानी की उपलब्धता और बिजली उत्पादन भी इससे प्रभावित हो सकते हैं। आने वाले समय में बारिश और जल संसाधनों की स्थिति अहम रहेगी। कृषि योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन, पानी के बेहतर प्रबंधन और बिजली संयंत्रों के लिए पर्याप्त ईंधन की उपलब्धता से संभावित संकट को कम करने में मदद मिल सकती है।