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पिता का सहारा बना ताकत... करियर प्रेशर से टूटी बेटी को शब्दों ने दी फिर से जीने की ताकत, Video Viral

 

आज के दौर में बढ़ता करियर प्रेशर युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य के लिए एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। नौकरी, प्रतिस्पर्धा और समाज की अपेक्षाओं के बीच कई युवा खुद को असफल और अकेला महसूस करने लगते हैं। ऐसी ही एक भावनात्मक घटना इन दिनों लोगों के दिलों को छू रही है, जहां भारी करियर दबाव से टूट चुकी एक बेटी को उसके पिता के कुछ शब्दों ने फिर से जीने की ताकत दे दी।

बताया जा रहा है कि बेटी लंबे समय से नौकरी की तलाश में थी। बार-बार असफलताओं और भविष्य की चिंता ने उसे अंदर से तोड़ दिया था। तनाव और निराशा के चलते वह भावनात्मक रूप से बेहद कमजोर हो चुकी थी और खुद को असफल मानने लगी थी। इसी मानसिक स्थिति में वह अपने पिता के सामने फूट-फूट कर रो पड़ी।

उस समय पिता ने जो कहा, वह न केवल उस बेटी के लिए, बल्कि हर युवा के लिए एक मजबूत संदेश बन गया। पिता ने बेटी को गले लगाते हुए कहा, “मत रोओ बेटा, नौकरी बहुत हैं… मैं तुम्हारे लिए कमाऊँगा।” ये शब्द किसी बड़े भाषण से नहीं, बल्कि एक पिता के दिल से निकले भरोसे और प्रेम से भरे थे।

पिता के इन सरल लेकिन गहरे शब्दों ने बेटी के मन से डर और असुरक्षा को कुछ पल के लिए दूर कर दिया। उसे यह एहसास हुआ कि उसकी पहचान केवल नौकरी से नहीं है और वह अकेली नहीं है। पिता का यह विश्वास उसके लिए ढाल बन गया, जिसने उसे फिर से खड़े होने का हौसला दिया।

मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि आज के समय में युवाओं को सबसे ज्यादा जरूरत भावनात्मक समर्थन की है। जब परिवार, खासकर माता-पिता, बिना शर्त साथ खड़े होते हैं, तो युवा किसी भी असफलता से उबर सकते हैं। इस घटना में पिता ने यह साबित किया कि कभी-कभी सही समय पर कहे गए कुछ शब्द किसी दवा से ज्यादा असरदार होते हैं।

सोशल मीडिया पर जब यह भावुक कहानी सामने आई, तो लोगों की आंखें नम हो गईं। कई यूजर्स ने लिखा कि यही असली पिता का प्यार है, जो बिना किसी अपेक्षा के संतान का साथ देता है। कुछ लोगों ने कहा कि काश हर बच्चे को ऐसा सहारा मिले, तो कोई भी टूटे नहीं।

इस घटना ने समाज को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या हम युवाओं पर जरूरत से ज्यादा दबाव तो नहीं डाल रहे। करियर जरूरी है, लेकिन उससे कहीं ज्यादा जरूरी मानसिक स्वास्थ्य और परिवार का साथ है। नौकरी का न मिलना जीवन की हार नहीं होती, लेकिन अपनों का साथ न मिलना इंसान को भीतर से तोड़ सकता है।