ट्रांसजेंडर पहचान और महिलाओं के आरक्षित अधिकारों पर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला, वीडियो में जाने महिला संगठन ने 2019 के कानून की धारा 7 को दी चुनौती
क्या जन्म के समय जैविक रूप से पुरुष घोषित व्यक्ति सर्जरी के बाद सरकारी दस्तावेजों में महिला के रूप में दर्ज होकर महिलाओं के लिए आरक्षित अधिकारों का दावा कर सकता है? इसी सवाल को लेकर एक महिला संगठन ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। संगठन ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की जेंडर पहचान को सरकारी दस्तावेजों में दर्ज करने से जुड़े कानूनी प्रावधानों को चुनौती दी है।
याचिकाकर्ता संगठन विमेंस डिक्लेरेशन इंटरनेशनल इंडिया ने ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 की धारा 7 और इससे जुड़े नियम 7 को चुनौती दी है। याचिका में दावा किया गया है कि इन प्रावधानों के तहत जन्म के समय जैविक रूप से पुरुष घोषित व्यक्ति सर्जरी के बाद सरकारी दस्तावेजों में अपनी पहचान महिला के रूप में दर्ज करा सकता है।
2019 के कानून की धारा 7 पर उठाए सवाल
संगठन की याचिका में ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 की धारा 7 और नियम 7 को लेकर आपत्ति जताई गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि इन प्रावधानों के कारण सर्जरी के बाद व्यक्ति को सरकारी रिकॉर्ड में महिला के रूप में पहचान दर्ज कराने की अनुमति मिलती है।महिला संगठन ने इस व्यवस्था के महिलाओं के लिए आरक्षित अधिकारों और सुविधाओं पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर सवाल उठाए हैं। याचिका में यह मुद्दा भी उठाया गया है कि महिला के रूप में कानूनी पहचान मिलने के बाद संबंधित व्यक्ति किन अधिकारों और सुविधाओं का दावा कर सकता है।
2014 के NALSA फैसले पर भी पुनर्विचार की मांग
इस याचिका में सुप्रीम कोर्ट के 2014 के NALSA फैसले पर भी पुनर्विचार करने की मांग की गई है। इस फैसले में अदालत ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की जेंडर पहचान को कानूनी मान्यता देने के अधिकार को स्वीकार किया था।NALSA फैसले को ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जाता है। इसमें व्यक्ति की जेंडर पहचान के अधिकार को मान्यता देने से जुड़े सिद्धांतों को स्पष्ट किया गया था। अब विमेंस डिक्लेरेशन इंटरनेशनल इंडिया ने इसी फैसले पर दोबारा विचार करने की मांग उठाई है।
महिलाओं के आरक्षित अधिकारों को लेकर कानूनी बहस
याचिका के जरिए महिला संगठन ने जैविक लिंग, जेंडर पहचान और कानूनी दस्तावेजों में दर्ज पहचान के बीच संबंध को लेकर सवाल उठाए हैं। खास तौर पर महिलाओं के लिए आरक्षित अधिकारों और सुविधाओं के दायरे को लेकर कानूनी स्पष्टता की मांग की गई है।इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने कानून की संबंधित धाराओं और 2014 के फैसले पर उठाई गई आपत्तियों पर विचार का मुद्दा होगा। हालांकि, याचिका में लगाए गए तर्क याचिकाकर्ता संगठन के दावे हैं। इन पर अदालत का अंतिम रुख सुनवाई और कानूनी परीक्षण के बाद ही स्पष्ट होगा।