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तलाकशुदा और विधवा महिलाओं के प्रति समाज का रवैया शर्मनाक: मौलाना इसहाक गोरा

 

सहारनपुर, 19 जनवरी (आईएएनएस)। देवबंद के प्रसिद्ध आलिम-ए-दीन और जमीयत दावतुल मुस्लिमीन के संरक्षक मौलाना कारी इसहाक गोरा ने महिलाओं के सम्मान और उनके प्रति समाज में व्याप्त रवैये पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि विशेष रूप से तलाकशुदा और विधवा महिलाओं के साथ समाज का व्यवहार न केवल असंवेदनशील है, बल्कि यह नैतिकता और मानवीय मूल्यों के भी विरुद्ध है।

हाल ही में जारी एक वीडियो संदेश में मौलाना कारी इसहाक गोरा ने कहा कि महिलाओं के सम्मान के सवाल पर हमारा समाज आज भी अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखा पा रहा है। उन्होंने अफसोस जताते हुए कहा कि जिन महिलाओं को सहारे, अपनत्व और इज्जत की सबसे अधिक जरूरत होती है, उन्हें शक, तानों और सवालों के कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है।

अपने संदेश में उन्होंने स्पष्ट किया कि तलाक या विधवा होना किसी महिला का दोष नहीं, बल्कि जीवन की एक कठिन और पीड़ादायक परीक्षा है। इसके बावजूद समाज ऐसे हालात से गुजर रही महिलाओं को रहमत और हमदर्दी की नजर से देखने के बजाय, उनके चरित्र और नीयत पर सवाल उठाने लगता है। यह सोच न केवल गलत है, बल्कि समाज को अंदर से कमजोर और खोखला करने वाली भी है।

मौलाना कारी इसहाक गोरा ने जोर देकर कहा कि इस्लामी शिक्षाएं महिलाओं को सम्मान, सुरक्षा और आत्मसम्मान के साथ जीवन जीने का पूरा अधिकार देती हैं। उन्होंने याद दिलाया कि इस्लाम ने तलाकशुदा और बेवा महिलाओं को नए सिरे से जीवन शुरू करने का हक दिया है और समाज को उनके साथ इंसाफ और इज्जत का व्यवहार करने की शिक्षा दी है।

उन्होंने कहा कि दुर्भाग्यवश आज हम धार्मिक शिक्षाओं की रूह को नजरअंदाज कर केवल सामाजिक रूढ़ियों और गलत परंपराओं के पीछे चल पड़े हैं। इसका परिणाम यह होता है कि पीड़ित महिला को ही दोषी ठहरा दिया जाता है, जबकि उसे सबसे अधिक सहारे, भरोसे और सम्मान की आवश्यकता होती है।

वीडियो संदेश के माध्यम से मौलाना ने समाज के सभी वर्गों से आत्ममंथन करने की अपील की। उन्होंने कहा कि यदि हम वास्तव में एक सभ्य, नैतिक और स्वस्थ समाज का निर्माण चाहते हैं तो महिलाओं के प्रति अपने रवैये में ईमानदार और व्यवहारिक बदलाव लाना होगा। केवल भाषणों और नारों से नहीं, बल्कि अपने आचरण से यह साबित करना होगा।

मौलाना कारी इसहाक गोरा ने कहा कि महिलाओं की इज्जत किसी पर एहसान नहीं, बल्कि उनका बुनियादी और नैसर्गिक अधिकार है। तलाकशुदा और बेवा महिलाओं को इल्जाम नहीं, बल्कि सम्मान, सहारा और नई शुरुआत का अवसर मिलना चाहिए। यही इंसानियत है, यही धर्म की सच्ची तालीम और यही एक स्वस्थ समाज की पहचान है।

--आईएएनएस

पीआईएम/वीसी