स्वानंद किरकिरे: निर्देशक बनने का सपना रह गया अधूरा, गीतकार बनकर दो बार लिया राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार
मुंबई, 28 अप्रैल (आईएएनएस)। फिल्मी दुनिया में स्वानंद किरकिरे ने एक शानदार गीतकार, गायक और अभिनेता के रूप में पहचान बनाई है, लेकिन बहुत ही कम लोग यह जानते हैं कि वह शुरुआत में निर्देशक बनना चाहते थे। थिएटर और कला की दुनिया से गहरा लगाव रखने वाले स्वानंद ने फिल्मों में कदम तो निर्देशन सीखने के इरादे से रखा था, लेकिन उनकी किस्मत में कुछ और ही लिखा था। उनके लिखे गीतों ने लोगों के दिलों में ऐसी जगह बनाई कि वह हिंदी सिनेमा के सबसे पसंद किए जाने वाले गीतकारों में शामिल हो गए। उनके शब्दों में भावनाएं इतनी गहरी होती हैं कि हर उम्र का इंसान उनसे जुड़ जाता है।
स्वानंद किरकिरे का जन्म 29 अप्रैल 1972 को इंदौर में एक मराठी परिवार में हुआ था। उनके पिता चिंतामणि और मां नीलांबरी दोनों शास्त्रीय संगीत से जुड़े हुए थे। घर में हमेशा संगीत और कला का माहौल रहता था। यही वजह थी कि बचपन से ही स्वानंद के मन में कला के लिए खास लगाव पैदा हो गया। हालांकि उन्होंने कॉमर्स की पढ़ाई की, लेकिन उनका मन किताबों से ज्यादा थिएटर और अभिनय की दुनिया में लगता था। अपने सपनों को पूरा करने के लिए वह दिल्ली पहुंचे और वहां नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में दाखिला लिया। यहीं से उनके जीवन ने नया मोड़ लिया।
थिएटर की पढ़ाई के दौरान उन्होंने अभिनय और कहानी कहने की कला को करीब से जाना। इसी दौरान उनकी दोस्ती नवाजुद्दीन सिद्दीकी जैसे कलाकारों से भी हुई।
पढ़ाई पूरी करने के बाद स्वानंद के मन में निर्देशक बनने का सपना था। वह कैमरे के पीछे रहकर कहानियां बनाना चाहते थे। दिल्ली में उनकी मुलाकात पीयूष मिश्रा से हुई, जिसके बाद उनका रुझान फिल्मों की तरफ और बढ़ गया। उन्होंने सहायक निर्देशक के तौर पर काम शुरू किया और बाद में निर्देशक सुधीर मिश्रा के साथ काम करने का मौका मिला। साल 2003 में फिल्म 'हजारों ख्वाहिशें ऐसी' में उन्होंने सहायक निर्देशक के रूप में काम किया। उन्होंने फिल्म के लिए 'बावरा मन देखने चला एक सपना' गीत लिखा और अपनी आवाज में गाया। यह गीत लोगों को इतना पसंद आया कि स्वानंद रातों-रात चर्चा में आ गए। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
धीरे-धीरे स्वानंद हिंदी सिनेमा का बड़ा नाम बन गए। उन्होंने 'परिणीता' का मशहूर गीत 'पियू बोले' लिखा, जिसे लोगों ने खूब पसंद किया। इसके बाद 'लगे रहो मुन्ना भाई' और '3 इडियट्स' जैसी फिल्मों के गानों ने उनके करियर को नई ऊंचाई दी। 'बंदे में था दम' और 'बहती हवा सा था वो' जैसे गीत आज भी लोगों की जुबान पर रहते हैं। इन गीतों के लिए उन्हें दो बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
गीत लेखन के साथ-साथ उन्होंने अभिनय में भी अपनी खास पहचान बनाई। 'बद्रीनाथ की दुल्हनिया', 'रात अकेली है' और वेब सीरीज 'पंचायत' में उनके अभिनय को काफी पसंद किया गया। फिल्म 'चुंबक' में शानदार अभिनय के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला।
--आईएएनएस
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