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सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी: 'सेकेंड क्लास' यात्री नहीं, वीडियो में जाने सिर्फ कोच होता है; ट्रेन हादसे में मृतक के परिवार को 8 लाख मुआवजे का आदेश

 

सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे यात्रियों के सम्मान और अधिकारों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा है कि किसी व्यक्ति की सामाजिक या आर्थिक हैसियत उसके यात्रा खर्च से नहीं आंकी जा सकती। अदालत ने रेलवे नियमों में इस्तेमाल होने वाले 'सेकेंड क्लास पैसेंजर' शब्द पर आपत्ति जताते हुए कहा कि 'सेकेंड क्लास' का संबंध केवल कोच की श्रेणी से होना चाहिए, यात्री की पहचान से नहीं।सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी ट्रेन हादसे में जान गंवाने वाले एक यात्री के परिवार को मुआवजा देने से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान की। अदालत ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट और रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल के फैसलों को पलटते हुए मृतक के परिजनों को 8 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया।

टिकट नहीं मिलने से नहीं छीना जा सकता मुआवजे का अधिकार

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सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि केवल इस आधार पर कि दुर्घटना के बाद मृतक के पास टिकट नहीं मिला, उसके परिवार को मुआवजे से वंचित नहीं किया जा सकता।अदालत ने कहा कि रेल दुर्घटनाओं में टिकट का खो जाना या न मिलना असामान्य बात नहीं है। ऐसे मामलों में केवल टिकट की अनुपस्थिति को आधार बनाकर पीड़ित परिवार के दावे को खारिज करना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।

हाईकोर्ट और ट्रिब्यूनल का फैसला पलटा

इस मामले में पहले रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल और बाद में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने मृतक के परिवार को मुआवजा देने से इनकार कर दिया था। दोनों अदालतों का मानना था कि टिकट नहीं मिलने के कारण यह साबित नहीं हो सका कि मृतक वैध यात्री था।हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस दृष्टिकोण से असहमति जताते हुए कहा कि उपलब्ध परिस्थितियों और तथ्यों को समग्र रूप से देखा जाना चाहिए। केवल टिकट न मिलने के आधार पर पीड़ित परिवार के अधिकारों को नकारा नहीं जा सकता।

केंद्र सरकार को चार सप्ताह में भुगतान का आदेश

जस्टिस संजय करोल और एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि मृतक के परिवार को चार सप्ताह के भीतर 8 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए।साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि यदि तय समय सीमा के भीतर भुगतान नहीं किया जाता है, तो दावा दायर किए जाने की तारीख से 8 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ पूरी राशि का भुगतान करना होगा।

यात्रियों के सम्मान पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे की शब्दावली पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि 'सेकेंड क्लास पैसेंजर' जैसे शब्द यह संदेश देते हैं कि यात्री भी किसी श्रेणी का होता है, जबकि वास्तविकता में श्रेणी केवल कोच की होती है, व्यक्ति की नहीं।कोर्ट ने कहा कि किसी यात्री की गरिमा उसके द्वारा खरीदे गए टिकट या यात्रा के खर्च से तय नहीं की जा सकती। सभी यात्रियों के साथ समान सम्मान और संवेदनशीलता का व्यवहार होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी न केवल रेलवे प्रशासन के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यात्रियों के अधिकारों और गरिमा को लेकर भी एक महत्वपूर्ण संदेश मानी जा रही है।