सहमति वाले किशोर संबंधों पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी, वीडियो में कहा- हर मामला अपने आप POCSO नहीं बन सकता
सुप्रीम कोर्ट ने किशोर-किशोरियों के बीच सहमति से बने संबंधों में पॉक्सो (POCSO) कानून के कथित दुरुपयोग पर गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने सोमवार को कहा कि यदि किसी लड़के और लड़की के बीच आपसी संबंध हैं और वे अपनी मर्जी से साथ चले जाते हैं, तो हर मामले को स्वतः पॉक्सो के तहत अपराध नहीं माना जा सकता। न्यायालय ने इस तरह के मामलों में संवेदनशील और संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया।
यह टिप्पणी जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने सुनवाई के दौरान की। पीठ ने सवाल उठाया कि आखिर सरकार किसी किशोर लड़के और लड़की को साथ भागने से कैसे रोक सकती है। अदालत ने कहा कि 15 से 18 वर्ष की उम्र जीवन का ऐसा दौर होता है, जब किशोर नई चीजों को समझने, भावनात्मक रूप से परिपक्व होने और रिश्तों को लेकर अनुभव हासिल करने की प्रक्रिया से गुजरते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस आयु वर्ग में कई बार किशोर-किशोरियां अपनी इच्छा से एक-दूसरे के साथ चले जाते हैं। लेकिन बाद में परिवार सामाजिक प्रतिष्ठा या तथाकथित सम्मान बचाने के लिए लड़के के खिलाफ पॉक्सो सहित अन्य गंभीर धाराओं में मामला दर्ज करा देता है।
पीठ ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में अदालतों के सामने अक्सर यह स्थिति आती है कि जांच और सुनवाई के बाद आरोप साबित नहीं हो पाते और अंततः आरोपी को बरी करना पड़ता है। इससे न केवल न्यायिक व्यवस्था पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है, बल्कि संबंधित युवाओं के भविष्य पर भी गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
हालांकि, अदालत ने यह स्पष्ट नहीं किया कि पॉक्सो कानून के प्रावधानों में किसी प्रकार का बदलाव किया जाना चाहिए। लेकिन उसने इस बात पर चिंता जरूर जताई कि सहमति वाले किशोर संबंधों से जुड़े मामलों में कानून के इस्तेमाल और उसके प्रभावों पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।
POCSO कानून बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से बनाया गया है और इसमें 18 वर्ष से कम आयु के व्यक्ति को कानूनी रूप से बच्चा माना जाता है। ऐसे में नाबालिग से जुड़े मामलों में सहमति का कानूनी महत्व सीमित होता है। इसी वजह से किशोर संबंधों से जुड़े कई मामलों में कानूनी और सामाजिक जटिलताएं सामने आती हैं।
सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी को ऐसे मामलों में कानून के व्यावहारिक इस्तेमाल और संवेदनशील दृष्टिकोण पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि, यह टिप्पणी किसी अंतिम फैसले के रूप में नहीं, बल्कि सुनवाई के दौरान अदालत द्वारा व्यक्त की गई प्रारंभिक चिंता है। आगे इस मामले में अदालत की विस्तृत सुनवाई और निर्णय पर सभी की नजर रहेगी।