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Supreme Court vs Election Commission: फॉर्म 6 बदलाव मामले पर भड़के CJI, चुनाव आयोग के दावे को ठहराया गलत

 

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने का अंतरिम आदेश देने से इनकार कर दिया। उनके खिलाफ आरोप लगाया गया है कि उन्होंने स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) से जुड़े करीब 14 फैसले दो अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना लिए।हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इन आरोपों को सीधे खारिज नहीं किया। कोर्ट ने इस मामले में चुनाव आयोग से जवाब मांगा है। अदालत ने कहा कि पहले संबंधित रिकॉर्ड और चुनाव आयोग का जवाब देखा जाएगा। अगर रिकॉर्ड से यह साबित होता है कि फैसले निर्धारित प्रक्रिया के बिना लिए गए थे, तो कोर्ट आगे उचित कार्रवाई पर विचार कर सकता है।

Form-6 में बदलाव को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने SIR में इस्तेमाल किए जा रहे Form-6 में बदलाव को लेकर भी सवाल उठाया।

कोर्ट ने कहा कि उसने Form-6 में किए गए संशोधन को मंजूरी नहीं दी है। अदालत यह पता लगाएगी कि इस फॉर्म में बदलाव किसके द्वारा और किस प्रक्रिया के तहत किया गया।

दरअसल, चुनाव आयोग की ओर से कुछ दिन पहले कहा गया था कि SIR के लिए Form-6 के साथ लगाए गए डिक्लेरेशन को सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी मिली है। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया था कि SIR के अलावा सामान्य अवधि में मतदाता पंजीकरण के लिए वही फॉर्म इस्तेमाल किए जाएंगे, जो मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 के तहत निर्धारित हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग समेत कई पक्षों को नोटिस भेजा

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार, चुनाव आयोग, CEC ज्ञानेश कुमार और दोनों चुनाव आयुक्तों समेत संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी किया है।

बेंच में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल हैं। कोर्ट ने सभी संबंधित पक्षों से चार सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है।

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में सामने आईं 4 अहम बातें

1. सिर्फ मीडिया रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई नहीं हो सकती

CJI सूर्यकांत ने कहा कि किसी अखबार में प्रकाशित खबर पूरी तरह सही, आंशिक रूप से सही या गलत भी हो सकती है। इसलिए केवल मीडिया रिपोर्ट के आधार पर मुख्य चुनाव आयुक्त को निलंबित करने का अंतरिम आदेश नहीं दिया जा सकता। पहले चुनाव आयोग का जवाब और संबंधित रिकॉर्ड देखना जरूरी है।

2. चुनाव आयोग के फैसले बहुमत या सर्वसम्मति से होने चाहिए

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि तीन सदस्यीय चुनाव आयोग में फैसले निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार लिए जाने चाहिए। किसी एक सदस्य द्वारा अकेले लिया गया फैसला पूरे आयोग का फैसला नहीं माना जा सकता।

3. अभी यह नहीं माना जा सकता कि CEC ने सभी फैसले अकेले लिए

अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल आरोपों के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि SIR से जुड़े सभी फैसले मुख्य चुनाव आयुक्त ने अकेले लिए थे। इसके लिए रिकॉर्ड की जांच जरूरी होगी।

4. रिकॉर्ड में एकतरफा फैसला साबित हुआ तो कार्रवाई संभव

कोर्ट ने संकेत दिया कि अगर रिकॉर्ड से यह सामने आता है कि किसी फैसले को जरूरी प्रक्रिया का पालन किए बिना लिया गया था, तो अदालत उस फैसले पर रोक लगाने या उसे वापस लेने जैसे विकल्पों पर विचार कर सकती है।

SIR के खिलाफ दाखिल हुईं दो PIL

SIR की प्रक्रिया को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में दो जनहित याचिकाएं दाखिल की गई हैं।

एक याचिका राकेश कुमार सिंह ने दायर की है, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने की मांग की गई है। उनकी ओर से एडवोकेट विकास सिंह ने दलीलें रखीं।

दूसरी याचिका शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की ओर से दाखिल की गई है। इस मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने पक्ष रखा।

क्या सुप्रीम कोर्ट CEC को सीधे निलंबित कर सकता है?

मामले में यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि क्या सुप्रीम कोर्ट के पास मुख्य चुनाव आयुक्त को सीधे निलंबित करने की शक्ति है।

संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग को चुनाव कराने और उसकी निगरानी की जिम्मेदारी दी गई है। वहीं चुनाव आयोग के फैसलों की न्यायिक समीक्षा संभव है। अगर कोई फैसला कानून या संविधान के खिलाफ पाया जाता है, तो अदालत उस पर रोक लगा सकती है या उसे रद्द कर सकती है।

हालांकि, मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने के लिए संविधान में अलग प्रक्रिया निर्धारित है।

मीडिया रिपोर्ट के बाद शुरू हुआ विवाद

ज्ञानेश कुमार को लेकर मौजूदा विवाद की शुरुआत एक मीडिया रिपोर्ट के बाद हुई। रिपोर्ट में SIR की प्रक्रिया को लेकर चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों का जिक्र किया गया था।

रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने चुनाव आयोग के भीतर SIR प्रक्रिया को लेकर कई बार अपनी चिंताएं जाहिर की थीं।

इसके बाद यह सवाल उठा कि क्या SIR से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण फैसले आयोग के सभी सदस्यों की सहमति से लिए गए थे या नहीं।

विपक्ष फिर ला सकता है महाभियोग प्रस्ताव

ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष की ओर से महाभियोग प्रस्ताव लाने की चर्चा भी तेज है। इससे पहले अप्रैल 2026 में भी विपक्ष ने उनके खिलाफ महाभियोग नोटिस दिया था। हालांकि लोकसभा में वह प्रस्ताव खारिज हो गया था, जबकि राज्यसभा में मामला लंबित बताया गया है।

मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया काफी कठिन है और इसके लिए संसद में विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है।

ज्ञानेश कुमार पर आगे क्या हो सकता है? 3 बड़ी संभावनाएं

1. कार्यकाल के दौरान कानूनी सुरक्षा

मुख्य चुनाव आयुक्त को मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 के तहत कुछ कानूनी सुरक्षा प्राप्त है। ऐसे में सामान्य पुलिस कार्रवाई या गिरफ्तारी के जरिए उन्हें पद से हटाना आसान नहीं है।

2. सरकार और भाजपा ने आरोपों को खारिज किया

सत्तारूढ़ भाजपा ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ लगाए गए आरोपों को खारिज किया है। पार्टी की ओर से इन आरोपों को आधारहीन बताया गया है।

ज्ञानेश कुमार का मौजूदा कार्यकाल जनवरी 2029 तक है। ऐसे में सामान्य परिस्थितियों में वह तब तक मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर बने रह सकते हैं।

3. महाभियोग ही सबसे बड़ा संवैधानिक रास्ता

संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए संसद की विशेष प्रक्रिया का पालन करना होता है।

महाभियोग प्रस्ताव को आगे बढ़ाने के लिए लोकसभा में कम से कम 100 सांसदों और राज्यसभा में 50 सांसदों के समर्थन की जरूरत होती है। इसके बाद दोनों सदनों में विशेष बहुमत की प्रक्रिया पूरी करनी होती है।

मौजूदा राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए विपक्ष के लिए दोनों सदनों में आवश्यक दो-तिहाई समर्थन जुटाना बड़ी चुनौती माना जा रहा है।

अब सुप्रीम कोर्ट के जवाब पर टिकी नजर

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने से इनकार करते हुए चुनाव आयोग और केंद्र समेत संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है। अब अगली सुनवाई में यह साफ हो सकता है कि SIR से जुड़े फैसले वास्तव में किस प्रक्रिया के तहत लिए गए थे और क्या उनमें चुनाव आयोग के सभी सदस्यों की सहमति शामिल थी।

यानी फिलहाल CEC पर तत्काल कार्रवाई नहीं हुई है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए रिकॉर्ड और चुनाव आयोग के जवाब को जांच के दायरे में जरूर ले लिया है।