दहेज केस पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, अब सालों तक नहीं लटकेगा मुकदमा; 90 दिन में आरोप तय करने का निर्देश
दहेज उत्पीड़न और दहेज मृत्यु से जुड़े मामलों में लंबे समय तक चलने वाली कानूनी प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने देशभर की ट्रायल अदालतों को ऐसे मामलों की सुनवाई प्राथमिकता के आधार पर करने और अनावश्यक देरी से बचने के निर्देश दिए हैं।
60 से 90 दिन में आरोप तय करने की कोशिश
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि चार्जशीट दाखिल होने के बाद सामान्य परिस्थितियों में 60 से 90 दिनों के भीतर आरोप तय करने का प्रयास किया जाए। इसके बाद उचित समय के भीतर गवाहों की गवाही शुरू हो और जहां संभव हो, लगातार या रोजाना सुनवाई की जाए।
हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि ये समयसीमाएं सामान्य दिशा-निर्देश हैं। कई आरोपी, अतिरिक्त चार्जशीट, फोरेंसिक जांच में देरी या आरोपी की गैर-मौजूदगी जैसी असाधारण परिस्थितियों में समय बढ़ सकता है, लेकिन ऐसी देरी का कारण रिकॉर्ड करना होगा।
बार-बार तारीख लेने पर लगेगी रोक
कोर्ट ने ट्रायल के दौरान बेवजह स्थगन यानी अगली तारीख देने की प्रवृत्ति पर भी रोक लगाने को कहा है। यदि किसी पक्ष के वकील की बार-बार गैर-मौजूदगी के कारण सुनवाई प्रभावित होती है, तो अदालत उचित स्थिति में लीगल एड काउंसिल या एमिकस क्यूरी की मदद लेकर कार्यवाही आगे बढ़ा सकती है।
गवाहों के लिए बनेगा खास कैलेंडर
आरोप तय होने के तुरंत बाद ट्रायल कोर्ट को एक विटनेस कैलेंडर तैयार करने का निर्देश दिया गया है। इसमें महत्वपूर्ण गवाहों की गवाही की तारीख, समन की प्रक्रिया और सबूत पेश करने का क्रम तय किया जा सकेगा।इसका मकसद यह है कि गवाहों को बार-बार अदालत बुलाने और फिर सुनवाई टलने की समस्या कम हो तथा सबूत जल्द रिकॉर्ड किए जा सकें।
पुराने मामलों की होगी निगरानी
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्टों से कहा है कि वे अपने अधिकार क्षेत्र में दहेज मृत्यु और दहेज उत्पीड़न से जुड़े लंबित मामलों की नियमित निगरानी करें। इसके लिए मौजूदा कोर्ट डैशबोर्ड और केस इंफॉर्मेशन सिस्टम में स्टेज-वाइज पेंडेंसी ट्रैकिंग, डिजिटल डैशबोर्ड और पुराने मामलों के लिए ऑटोमेटेड अलर्ट जैसी व्यवस्था विकसित करने को कहा गया है। तीन साल से ज्यादा समय से लंबित मामलों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत बताई गई है, ताकि लंबे समय से अटके मुकदमों की पहचान कर उनकी सुनवाई तेज की जा सके।
गंभीर मामलों में मध्यस्थता से बचने का संकेत
कोर्ट के निर्देशों के मुताबिक सामान्य पारिवारिक विवादों में काउंसलिंग या मध्यस्थता का रास्ता अपनाया जा सकता है, लेकिन दहेज मृत्यु या गंभीर हिंसा जैसे मामलों को महज समझौते के लिए मध्यस्थता की प्रक्रिया में नहीं भेजा जाना चाहिए।
पुराने कानूनों के साथ नए BNS प्रावधान भी लागू
दहेज मृत्यु के लिए पहले IPC की धारा 304-B और दहेज उत्पीड़न के लिए धारा 498-A का इस्तेमाल होता था। नए आपराधिक कानून लागू होने के बाद इनके समान प्रावधान BNS की धारा 80 और 85 में हैं।सुप्रीम कोर्ट के इन निर्देशों का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि दहेज से जुड़े गंभीर मामलों में पीड़ित पक्ष को वर्षों तक न्याय का इंतजार न करना पड़े और ट्रायल प्रक्रिया समयबद्ध तरीके से आगे बढ़े।