OBC क्रीमी लेयर पर केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट से झटका, सिर्फ माता-पिता की सैलरी से तय नहीं होगी पात्रता; 8 हफ्ते में लागू करना होगा फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने यूपीएससी परीक्षाओं में ओबीसी आरक्षण के तहत क्रीमी लेयर तय करने के मामले में केंद्र सरकार को बड़ा झटका दिया है। अदालत ने केंद्र सरकार की संशोधन याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि ओबीसी उम्मीदवारों को आरक्षण के दायरे से बाहर करने के लिए केवल उनके माता-पिता की सैलरी या आय को आधार नहीं बनाया जा सकता। क्रीमी लेयर का निर्धारण करते समय माता-पिता की सामाजिक स्थिति और उनके पद की प्रकृति को भी ध्यान में रखना जरूरी है। कोर्ट ने केंद्र सरकार को अपने फैसले का पालन करने के लिए आठ सप्ताह का अतिरिक्त समय दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी उम्मीदवार को ओबीसी आरक्षण का लाभ देने या उससे बाहर करने का फैसला केवल आर्थिक आधार पर नहीं किया जा सकता। इसके लिए यह देखना जरूरी है कि उम्मीदवार के माता-पिता किस सामाजिक और प्रशासनिक स्थिति में हैं। उनके पद का स्तर और उसकी प्रकृति भी क्रीमी लेयर निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अदालत के मुताबिक, केवल वेतन को आधार बनाकर किसी परिवार को क्रीमी लेयर में शामिल करना उचित नहीं है।
PSU और सरकारी कर्मचारियों के बच्चों के बीच भेदभाव पर सवाल
इस मामले में केंद्र सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSU) और निजी क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों के पदों की तुलना सरकारी पदों से करने के लिए नई व्यवस्था बनाने की मांग की थी। सरकार ने इसके लिए सुप्रीम कोर्ट से दो साल का समय मांगा था। केंद्र का कहना था कि सरकारी पदों और पीएसयू या निजी क्षेत्र के पदों की समानता तय करने के लिए एक व्यवस्थित प्रक्रिया तैयार करने की जरूरत है।हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की दो साल का समय देने की मांग स्वीकार नहीं की। अदालत ने सरकार को फैसले का पालन करने के लिए केवल आठ सप्ताह का अतिरिक्त समय दिया है। इससे केंद्र सरकार को निर्धारित अवधि के भीतर इस मामले में आवश्यक कदम उठाने होंगे।
सरकारी और PSU कर्मचारियों के बच्चों के साथ समान व्यवहार जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सरकारी कर्मचारियों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में काम करने वाले कर्मचारियों के बच्चों के साथ अलग-अलग व्यवहार किए जाने पर भी सवाल उठाए थे। अदालत ने कहा था कि यदि सरकारी कर्मचारियों के बच्चों की क्रीमी लेयर स्थिति तय करते समय उनके माता-पिता के पद और सामाजिक स्थिति को महत्व दिया जाता है, तो पीएसयू कर्मचारियों के बच्चों को केवल उनकी सैलरी के आधार पर आरक्षण से बाहर करना सही नहीं है।अदालत के अनुसार, इस तरह का अंतर समानता के अधिकार के सिद्धांत के खिलाफ हो सकता है। इसलिए दोनों वर्गों के कर्मचारियों के बच्चों के लिए क्रीमी लेयर निर्धारित करने में समान और तार्किक मानदंड अपनाना जरूरी है।
14 मार्च को भी कोर्ट ने दी थी अहम टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने इसी साल 14 मार्च को हुई सुनवाई के दौरान भी इस मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी। अदालत ने कहा था कि वर्ष 2004 में जारी एक पत्र मुख्य आरक्षण नीति में बदलाव नहीं कर सकता। किसी प्रशासनिक पत्र के आधार पर क्रीमी लेयर निर्धारित करने के मूल सिद्धांतों को बदला नहीं जा सकता।अब संशोधन याचिका खारिज होने के बाद केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार व्यवस्था लागू करनी होगी। इस फैसले का असर यूपीएससी सहित उन भर्तियों पर पड़ सकता है, जिनमें ओबीसी आरक्षण के लिए क्रीमी लेयर की पात्रता निर्धारित की जाती है। इससे उन अभ्यर्थियों को राहत मिलने की उम्मीद है, जिनके माता-पिता की सैलरी अधिक होने के बावजूद उनका सामाजिक और पद संबंधी स्तर क्रीमी लेयर के निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं है। हालांकि, आरक्षण का लाभ संबंधित नियमों और पात्रता शर्तों के आधार पर ही मिलेगा।