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CBSE की थ्री लैंग्वेज पॉलिसी पर सुप्रीम कोर्ट के सवाल, वीडियो में पूछा- क्या उत्तर के छात्र दक्षिण और दक्षिण के छात्र उत्तर की भाषाएं सीखें?

 

सुप्रीम कोर्ट ने CBSE की थ्री लैंग्वेज पॉलिसी को लेकर गुरुवार को कई महत्वपूर्ण सवाल उठाए। अदालत ने नीति के तहत छात्रों पर पड़ने वाले शैक्षणिक बोझ, स्कूलों में किताबों और शिक्षकों की उपलब्धता तथा अलग-अलग स्कूलों में इसके लागू होने के तरीके को लेकर केंद्र और संबंधित पक्षों से जवाब मांगा। यह मामला CBSE की कक्षा 9 के छात्रों के लिए NEP 2020 के तहत लागू की गई थ्री लैंग्वेज पॉलिसी को चुनौती देने वाली याचिकाओं से जुड़ा है।

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CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही है। सुनवाई के दौरान बेंच ने भाषा सीखने के व्यापक उद्देश्य को लेकर भी सवाल किया। अदालत ने पूछा कि क्या देश के लिए यह अच्छा नहीं होगा कि उत्तर भारत के छात्र दक्षिण भारतीय भाषाएं सीखें और दक्षिण भारत के छात्र उत्तर भारतीय भाषाएं सीखें। कोर्ट की इस टिप्पणी ने भाषा शिक्षा और देश में भाषाई विविधता को लेकर चल रही बहस को व्यापक संदर्भ दे दिया।

याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत को बताया गया कि CBSE की नई व्यवस्था के तहत छात्रों को तीन भाषाओं का अध्ययन करना होगा, जिनमें दो भारतीय मूल भाषाएं शामिल हैं। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि देश के कई स्कूलों में इस व्यवस्था को लागू करने के लिए आवश्यक संसाधन मौजूद नहीं हैं। कई संस्थानों में संबंधित भारतीय भाषाओं के शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं और पर्याप्त किताबें तथा अन्य शैक्षणिक सुविधाएं भी नहीं हैं।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील आनंद ग्रोवर ने भाषा सीखने की व्यावहारिक कठिनाइयों का उदाहरण देते हुए सवाल उठाया कि कोई बच्चा अचानक पंजाबी या तमिल जैसी भाषा कैसे सीखना शुरू करेगा। उन्होंने कहा कि यदि छात्र को भाषा की जानकारी नहीं है तो उसे सबसे पहले वर्णमाला से शुरुआत करनी होगी। इसके विपरीत, कई उपलब्ध पाठ्यपुस्तकें सीधे वाक्यों से शुरू होती हैं, जिससे शुरुआती स्तर के छात्रों के लिए परेशानी पैदा हो सकती है।

याचिकाकर्ताओं ने अदालत के सामने यह भी मुद्दा उठाया कि अलग-अलग स्कूलों में भाषा नीति लागू करने की स्थिति एक जैसी नहीं है। कुछ स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक और संसाधन उपलब्ध हो सकते हैं, जबकि कई अन्य संस्थानों में संबंधित भाषा पढ़ाने के लिए न तो प्रशिक्षित शिक्षक हैं और न ही पर्याप्त अध्ययन सामग्री। ऐसे में नीति को पूरे देश में एक समान तरीके से लागू करना व्यावहारिक चुनौती बन सकता है।

अदालत ने बच्चों पर पढ़ाई के अतिरिक्त बोझ को लेकर भी सवाल किया। बेंच यह समझना चाहती है कि तीन भाषाओं की पढ़ाई से छात्रों के मौजूदा पाठ्यक्रम और उनके अध्ययन के समय पर कितना प्रभाव पड़ेगा। साथ ही यह भी महत्वपूर्ण है कि नई नीति लागू करते समय छात्रों की उम्र, उनकी भाषाई पृष्ठभूमि और स्कूलों की क्षमता को किस तरह ध्यान में रखा जा रहा है।

NEP 2020 में भारतीय भाषाओं के अध्ययन और बहुभाषी शिक्षा को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया है। इसी दिशा में CBSE ने कक्षा 9 से तीन भाषाओं के अध्ययन से जुड़ी व्यवस्था लागू की है। इसका उद्देश्य छात्रों को भारतीय भाषाओं की विविधता से परिचित कराना और बहुभाषिकता को बढ़ावा देना है।

हालांकि, याचिकाकर्ताओं का कहना है कि नीति का उद्देश्य भले ही महत्वपूर्ण हो, लेकिन इसके लिए स्कूलों में पर्याप्त संसाधनों की व्यवस्था भी जरूरी है। बिना शिक्षकों, किताबों और उचित बुनियादी ढांचे के छात्रों से नई भाषाएं सीखने की अपेक्षा करना उनके लिए अतिरिक्त दबाव पैदा कर सकता है।

अब सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि CBSE और सरकार इन सवालों पर क्या जवाब देते हैं। अदालत के सामने नीति के उद्देश्य के साथ उसके व्यावहारिक क्रियान्वयन और छात्रों पर पड़ने वाले प्रभाव का मुद्दा भी प्रमुख बना हुआ है।