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सुप्रीम कोर्ट की मीडिया को सलाह: यौन अपराधों की खबरों में संवेदनशीलता बरतें, वीडियो में जाने पीड़ित की पहचान उजागर न करें

 

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को यौन अपराधों की रिपोर्टिंग को लेकर मीडिया संस्थानों को जिम्मेदारी और संवेदनशीलता बरतने की सलाह दी। अदालत ने कहा कि यौन हिंसा से जुड़े मामलों में सनसनीखेज हेडलाइन, ग्राफिक विवरण या भड़काऊ जानकारी प्रकाशित करना जनहित में नहीं है। इससे पीड़ित और उनके परिवारों को गंभीर मानसिक पीड़ा पहुंच सकती है।जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने यह टिप्पणी गैंगरेप से जुड़े तीन मामलों की सुनवाई के दौरान की। सुप्रीम कोर्ट ने इन मामलों पर खुद संज्ञान लिया था।

पीड़ित की पहचान उजागर करने पर रोक

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडि संस्थानों को यौन अपराधों से जुड़े मामलों की रिपोर्टिंग करते समय कानून का पालन करना होगा। अदालत ने विशेष रूप से पॉक्सो एक्ट (POCSO Act) की धारा 23 का उल्लेख किया।इस धारा के तहत यौन हमले के पीड़ित या किसी नाबालिग बच्चे की पहचान सार्वजनिक करने पर रोक है। कोर्ट ने कहा कि मीडिया को रिपोर्टिंग करते समय पीड़ितों की निजता और सम्मान का ध्यान रखना चाहिए।

सनसनीखेज रिपोर्टिंग से बचने की जरूरत

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अपराध की जानकारी देना मीडिया की जिम्मेदारी है, लेकिन रिपोर्टिंग का तरीका ऐसा नहीं होना चाहिए जिससे पीड़ित को दोबारा मानसिक आघात पहुंचे।अदालत ने कहा कि यौन अपराधों की खबरों में अनावश्यक विवरण, आपत्तिजनक भाषा और ऐसी जानकारी से बचना चाहिए, जो पीड़ित या परिवार की मुश्किलें बढ़ा सकती है।

जिला प्रशासन मीडिया संस्थानों के साथ करे बैठक

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने निर्देश दिया कि जिला प्रशासन को मीडिया संस्थानों के साथ तुरंत बैठक करनी चाहिए। अदालत ने सुझाव दिया कि अखबारों में इसके लिए एक अलग कॉलम और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में अलग समय निर्धारित किया जाना चाहिए।कोर्ट ने कहा कि मीडिया संस्थान ऐसे नंबरों और जागरूकता से जुड़े संदेशों के लिए बिना शुल्क यानी प्रो बोनो स्थान या समय उपलब्ध करा सकते हैं।

मीडिया से जिम्मेदारी निभाने की उम्मीद

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उसे उम्मीद है कि प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अपनी जिम्मेदारी को समझते हुए यौन अपराधों की रिपोर्टिंग में संवेदनशीलता बरतेगा।अदालत ने कहा कि मीडिया लोकतंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है और उसकी भूमिका केवल खबर पहुंचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज में जागरूकता और जिम्मेदार व्यवहार को बढ़ावा देना भी है।सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया के दौर में अपराधों की खबरें तेजी से फैलती हैं। अदालत ने पीड़ितों के अधिकारों और उनकी निजता की रक्षा को रिपोर्टिंग का अहम हिस्सा बताया है।