सुलभा देशपांडे की विरासत आज भी प्रेरणादायी, शिक्षिका से रंगमंच की 'महान नायिका' बनने का था सफर
नई दिल्ली, 3 जून (आईएएनएस)। भारतीय रंगमंच और सिनेमा के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जिन्होंने अपनी कला, संवेदनशीलता और सामाजिक प्रतिबद्धता से एक स्थायी पहचान बनाई। इन्हीं में से एक दिग्गज अभिनेत्री और रंगकर्मी सुलभा देशपांडे का नाम है। मराठी रंगमंच, हिंदी फिल्मों और टेलीविजन की दुनिया में उन्होंने अपने बहुआयामी योगदान से एक विशिष्ट स्थान बनाया।
दिग्गज अभिनेत्री और रंगकर्मी सुलभा देशपांडे का 4 जून 2016 को मुंबई स्थित अपने निवास पर लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया था। वह 79 वर्ष की थीं। उनके निधन से भारतीय रंगमंच और फिल्म जगत ने अपनी एक महत्वपूर्ण हस्ती को खो दिया।
1937 में बॉम्बे (मुंबई) में जन्मी सुलभा देशपांडे ने सिद्धार्थ कॉलेज से शिक्षा में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। प्रारंभ में उन्होंने छबीलदास हाई स्कूल में शिक्षिका के रूप में कार्य किया, लेकिन रंगमंच के प्रति उनके गहरे लगाव ने उन्हें अभिनय और नाट्य गतिविधियों की ओर आकर्षित किया।
उन्होंने अपना जीवन कला और विशेष रूप से बाल रंगमंच के विकास के लिए समर्पित कर दिया। बच्चों के लिए अनेक नाटकों का निर्देशन, प्रशिक्षण शिविरों का आयोजन तथा बाल रंगमंच के अध्ययन के लिए विदेश यात्राएं उनके इसी समर्पण का प्रमाण हैं।
रंगमंच के क्षेत्र में सुलभा देशपांडे का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। उन्होंने 1960 में रंगायन की स्थापना में सहयोग दिया। बाद में अपने पति अरविंद देशपांडे तथा अरुण काकडे के साथ मिलकर प्रयोगधर्मी नाट्य संस्था आविष्कार की स्थापना की। इस संस्था ने मराठी रंगमंच में नए प्रयोगों को बढ़ावा दिया और प्रसिद्ध ‘छबीलदास आंदोलन’ की नींव रखी।
सुलभा देशपांडे को सबसे अधिक प्रसिद्धि विजय तेंदुलकर के चर्चित नाटक 'शांतता! कोर्ट चालू आहे' में निभाई गई भूमिका से मिली। इस नाटक का पहला मंचन 1968 में हुआ था और इसमें उनके अभिनय को आलोचकों तथा दर्शकों दोनों ने सराहा। इसके अतिरिक्त 'सखाराम बिंदर', 'राजा रानीला घाम हवा', 'दुर्गा झाली गौरी' और 'बाबा हरवले आहेत' जैसे नाटकों में भी उनके अभिनय ने गहरी छाप छोड़ी। उन्होंने बादल सरकार के प्रसिद्ध नाटक ‘एवम इंद्रजीत’ सहित कई हिंदी और मराठी प्रस्तुतियों में भी उल्लेखनीय अभिनय किया।
फिल्मों में उनका पदार्पण 1971 में 'शांतता! कोर्ट चालू आहे' से हुआ। हिंदी सिनेमा में उन्होंने भूमिका, गमन, सलाम बॉम्बे!, विरासत और इंग्लिश विंग्लिश जैसी फिल्मों में प्रभावशाली अभिनय किया। उनकी अंतिम बॉलीवुड फिल्म इंग्लिश विंग्लिश थी। टेलीविजन पर भी उन्होंने ‘तन्हा’, ‘एक पैकेट उम्मीद’, ‘कहता है दिल जी ले जरा’, ‘मिसेज तेंदुलकर’ और ‘अस्मिता’ जैसी लोकप्रिय धारावाहिकों में अपनी प्रतिभा का परिचय दिया।
रंगमंच और कला के क्षेत्र में उनके अमूल्य योगदान को सम्मानित करते हुए वर्ष 1987 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया। सुलभा देशपांडे का जीवन कला, शिक्षा और सामाजिक चेतना का अद्भुत संगम था। वे केवल एक अभिनेत्री नहीं, बल्कि भारतीय रंगमंच की एक प्रेरणादायी संस्था थीं, जिनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।
--आईएएनएस
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