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सुभद्रा कुमारी चौहान: असहयोग आंदोलन में हिस्सा लेने वाली पहली भारतीय महिला, कविताओं से जगाई आजादी की अलख

 

नई दिल्ली, 15 अगस्त (आईएएनएस)। सुभद्रा कुमारी चौहान को असहयोग आंदोलन में भाग लेने वाली पहली भारतीय महिला होने का गौरव प्राप्त है। उनका जन्म 16 अगस्त 1904 को उत्तर प्रदेश के प्रयागराज के निहालपुर गांव में ठाकुर रामनाथ सिंह के घर हुआ था।

उन्होंने शुरू में प्रयागराज के क्रॉस्थवेट गर्ल्स स्कूल में पढ़ाई की और 1919 में मिडिल स्कूल की परीक्षा पास की। उसी साल खंडवा के ठाकुर लक्ष्मण सिंह चौहान से शादी के बाद वह जबलपुर चली गईं।

"आ रही हिमालय से पुकार, है उदधि गरजता बार-बार, प्राची पश्चिम भू नभ अपार; सब पूछ रहे हैं दिग-दिगंत, वीरों का कैसा हो वसंत?"

उन्होंने न सिर्फ असहयोग आंदोलन में भाग लिया, बल्कि कई प्रेरणादायक देशभक्तिपूर्ण कविताएं भी लिखीं। उन्होंने भारत की आजादी की लड़ाई में सक्रिय भूमिका निभाई, जिसके कारण उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा और यातनाएं सहनी पड़ीं। उन्होंने अपनी कहानियों में इन यातनाओं के अपने अनुभवों को भी शेयर किया।

"सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी, बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी, गुमी हुई आजादी की कीमत सबने पहचानी थी, दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।

चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।"

उन्होंने अपनी साहित्यिक रचनाओं के माध्यम से अन्य लोगों को आजादी की लड़ाई में शामिल होने के लिए प्रेरित किया। लोगों को प्रेरित करने के लिए उन्होंने जोशीले क्रांतिकारी भाषण भी दिए। उनकी बहुत प्रसिद्ध कविता 'खूब लड़ी मर्दानी' के माध्यम से ही रानी लक्ष्मीबाई की कहानी भारत में घर-घर तक पहुंच सकी और बच्चे झांसी की रानी की वीरता और अदम्य साहस के बारे में जान सके।

"यह कदंब का पेड़ अगर मां होता यमुना तीरे, मैं भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे। ले देतीं यदि मुझे बांसुरी तुम दो पैसे वाली, किसी तरह नीची हो जाती यह कदंब की डाली।"

उस समय साहित्य के क्षेत्र में पुरुषों का दबदबा होने के बावजूद उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाकर अपने लिए एक खास जगह बनाई। उनकी पहली कविता नौ साल की उम्र में ही प्रकाशित हुई थी। कुल मिलाकर, उनकी 88 कविताएं और 46 लघु कथाएं प्रकाशित हुईं। 'बिखरे मोती', 'उन्मादिनी' (1934), 'सीधे-साधे चित्र' (1947) के साथ-साथ कविता संग्रह 'मुकुल', 'खिलौनेवाला', 'ये कदंब का पेड़' और 'त्रिधारा' भी प्रकाशित हुए।

भारतीय तटरक्षक बल के एक जहाज का नाम उनके नाम पर रखा गया है। राष्ट्रीय सोच रखने वाली जागरूक लेखिका चौहान की कविताएं मुख्य रूप से भारतीय महिलाओं को पेश आने वाली मुश्किलों, जैसे 'लिंग और जाति के आधार पर भेदभाव', पर केंद्रित थीं।

सुभद्रा कुमारी चौहान का निधन 15 फरवरी 1948 को 44 साल की उम्र में हुआ था।

--आईएएनएस

डीसीएच/एबीएम