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पंजाब में बेअदबी पर सख्त कानून की तैयारी, लेकिन सामने आई फर्जी फोरेंसिक रिपोर्टों की परतें; भगवंत मान सरकार पर बढ़ा दबाव

 

चंडीगढ़: पंजाब में धार्मिक ग्रंथों की बेअदबी के मामलों को लेकर सियासत एक बार फिर गरमा गई है। मुख्यमंत्री भगवंत मान सरकार जहां बेअदबी की घटनाओं पर कड़ा कानून लाने की तैयारी कर रही है, वहीं पुराने मामलों की जांच में कथित फर्जी फोरेंसिक रिपोर्टों का खुलासा होने के बाद विवाद और गहरा गया है। इस घटनाक्रम ने जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली और न्यायिक प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

सरकार ने संकेत दिए हैं कि प्रस्तावित एंटी-बेअदबी कानून के तहत धार्मिक ग्रंथों के अपमान से जुड़े मामलों में सख्त सजा का प्रावधान किया जाएगा। राज्य सरकार का कहना है कि कानून का उद्देश्य किसी विशेष समुदाय को निशाना बनाना नहीं, बल्कि सभी धर्मों के पवित्र ग्रंथों का सम्मान सुनिश्चित करना और ऐसी घटनाओं पर प्रभावी रोक लगाना है।

हालांकि इसी बीच पुराने बेअदबी मामलों की जांच से जुड़ा एक नया विवाद सामने आया है। रिपोर्टों के अनुसार, कुछ मामलों में फोरेंसिक जांच रिपोर्टों की विश्वसनीयता पर सवाल उठे हैं। आरोप है कि जांच के दौरान प्रस्तुत की गई कुछ रिपोर्टें वास्तविक तथ्यों से मेल नहीं खाती थीं, जिससे कई मामलों की जांच प्रभावित हुई। इन खुलासों के बाद विपक्षी दलों ने सरकार और जांच एजेंसियों पर तीखे सवाल उठाए हैं।

अकाल तख्त से जुड़े धार्मिक नेताओं ने भी बेअदबी के मामलों की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच की मांग की है। उनका कहना है कि यदि जांच में किसी प्रकार की अनियमितता या फर्जीवाड़ा हुआ है, तो इसकी स्वतंत्र जांच कर दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए। धार्मिक संगठनों का मानना है कि ऐसे मामलों में किसी भी प्रकार की लापरवाही लोगों की आस्था को प्रभावित करती है।

राजनीतिक हलकों में भी यह मुद्दा चर्चा का केंद्र बन गया है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार को केवल नया कानून लाने पर ही नहीं, बल्कि पुराने मामलों में न्याय सुनिश्चित करने पर भी समान रूप से ध्यान देना चाहिए। उनका कहना है कि यदि जांच प्रक्रिया पर ही सवाल खड़े हो जाएं, तो दोषियों को सजा दिलाना और निर्दोषों को न्याय दिलाना दोनों ही कठिन हो जाते हैं।

दूसरी ओर, राज्य सरकार का कहना है कि बेअदबी की घटनाओं के प्रति उसकी नीति पूरी तरह 'जीरो टॉलरेंस' की है। सरकार का दावा है कि प्रस्तावित कानून के जरिए ऐसे अपराधों के लिए स्पष्ट कानूनी प्रावधान बनाए जाएंगे, ताकि भविष्य में किसी भी प्रकार की अस्पष्टता न रहे और दोषियों के खिलाफ त्वरित कार्रवाई हो सके।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी नए कानून की सफलता उसकी निष्पक्ष जांच और प्रभावी क्रियान्वयन पर निर्भर करती है। यदि फोरेंसिक जांच या साक्ष्य संग्रह की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं होगी, तो अदालत में मामलों को साबित करना मुश्किल हो सकता है। इसलिए कानून के साथ-साथ जांच एजेंसियों की जवाबदेही और वैज्ञानिक जांच प्रणाली को भी मजबूत करना आवश्यक है।

पंजाब में वर्ष 2015 से बेअदबी के कई मामले राजनीतिक और सामाजिक बहस का विषय रहे हैं। इन घटनाओं को लेकर विभिन्न आयोगों और विशेष जांच दलों (SIT) ने समय-समय पर जांच की है। अब कथित फर्जी फोरेंसिक रिपोर्टों का मुद्दा सामने आने के बाद पुराने मामलों की जांच एक बार फिर सुर्खियों में आ गई है।