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भविष्य बचाना है तो भूमि बचानी होगी, विश्व मरुस्थलीकरण एवं सूखा निवारण दिवस का यही संदेश

 

नई दिल्ली, 16 जून (आईएएनएस)। जरा कल्पना कीजिए उस धरती की, जिसने सदियों से आपको भोजन, जल और जीवन देने का काम किया, लेकिन वही धरती अब अपनी उर्वरता खो रही है। खेत बंजर हो रहे हैं, जल के स्रोत सूख रहे हैं और हर तरफ रेतीली जमीन फैलती जा रही है। यह किसी रेगिस्तान के विस्तार की कहानी से कहीं बढ़कर मानव अस्तित्व से जुड़ी एक गंभीर चेतावनी है। यही कारण है कि हर वर्ष 17 जून को विश्व मरुस्थलीकरण और सूखा निवारण दिवस मनाया जाता है। इस दिन को मनाने का उद्देश्य दुनिया को भूमि संरक्षण और उसके सतत उपयोग के महत्व का एहसास कराना है।

मरुस्थलीकरण और सूखा आज वैश्विक चिंता का विषय बन चुके हैं। इनका प्रभाव किसी एक देश या महाद्वीप तक सीमित नहीं है। दुनिया के लगभग सभी क्षेत्रों पर इसका प्रभाव पड़ रहा है। अफ्रीका जैसे क्षेत्रों में इसके दुष्प्रभाव अधिक गंभीर रूप से देखने को मिलते हैं। इन चुनौतियों से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साझा प्रयासों और ठोस रणनीति की आवश्यकता है।

इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए संयुक्त राष्ट्र महासभा ने दिसंबर 1994 में एक प्रस्ताव पारित कर 17 जून को मरुस्थलीकरण और सूखा निवारण के लिए विश्व दिवस घोषित किया था। इसके बाद वर्ष 1995 में पहली बार यह दिवस आधिकारिक रूप से मनाया गया। इस दिवस के आयोजन की जिम्मेदारी संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण रोकथाम सम्मेलन के सचिवालय द्वारा निभाई जाती है।

मरुस्थलीकरण का अर्थ रेगिस्तान का विस्तार माना जाता है, हालांकि वास्तविकता इससे कहीं अधिक व्यापक है। मरुस्थलीकरण का आशय शुष्क, अर्ध-शुष्क और शुष्क उप-आर्द्र क्षेत्रों में भूमि की उत्पादक क्षमता का कम होना या उसका बंजर हो जाना है। यह स्थिति मुख्य रूप से मानवीय गतिविधियों और जलवायु परिवर्तन के कारण उत्पन्न होती है। विश्व के एक तिहाई से अधिक भूभाग पर फैले शुष्क भूमि पारिस्थितिकी तंत्र अत्यधिक दोहन और अनुचित भूमि उपयोग के प्रति बेहद संवेदनशील हैं। इसका सबसे अधिक असर उन गरीब समुदायों पर पड़ता है, जिनकी आजीविका सीधे भूमि और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर करती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि भूमि क्षरण केवल औद्योगिक गतिविधियों या बड़े विकास कार्यों का परिणाम नहीं है। हम प्रतिदिन क्या खरीदते हैं, क्या खाते हैं, किस प्रकार के वस्त्रों का उपयोग करते हैं और किस तरह यात्रा करते हैं, इन सभी निर्णयों का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभाव भूमि संसाधनों पर पड़ता है। यही वजह है कि इस दिवस का एक प्रमुख उद्देश्य आम लोगों के बीच जागरूकता बढ़ाना और यह संदेश देना है कि भूमि क्षरण तटस्थता हासिल की जा सकती है, यदि समय रहते सामूहिक प्रयास किए जाएं।

भूमि क्षरण का सीधा संबंध खाद्य और जल सुरक्षा से है। दुनिया की बड़ी आबादी शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में निवास करती है। जब भूमि की उत्पादकता घटती है, तो कृषि प्रभावित होती है, जिससे भोजन की उपलब्धता कम होती है और जल संकट भी गहराता है। परिणामस्वरूप गरीबी, पलायन और सामाजिक अस्थिरता जैसी समस्याएं जन्म लेती हैं। स्वस्थ भूमि प्राकृतिक रूप से कार्बन को अवशोषित कर जलवायु संतुलन बनाए रखने में मदद करती है। इसके विपरीत क्षरित भूमि कार्बन उत्सर्जन को बढ़ावा देकर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को और अधिक गंभीर बना देती है। इसलिए भूमि संरक्षण को जलवायु परिवर्तन से लड़ाई का एक महत्वपूर्ण हथियार माना जाता है।

इस दिवस को मनाने का मुख्य उद्देश्य लोगों को यह समझाना है कि स्वस्थ भूमि आर्थिक और सामाजिक विकास की आधारशिला है। इसके अलावा, भूमि के अत्यधिक दोहन और अनुचित उपयोग को रोकने के लिए प्रेरित करना। बंजर और क्षरित भूमि को पुनः उपजाऊ बनाने के लिए निवेश और प्रयास बढ़ाना और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को जन आंदोलन का रूप देना है।

मरुस्थलीकरण की चुनौती से निपटने के लिए सरकार भी विभिन्न स्तरों पर प्रयास कर रही है। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा भूमि संरक्षण और सतत विकास से जुड़ी कई नीतियां लागू की गई हैं।

विश्व मरुस्थलीकरण और सूखा निवारण दिवस धरती के भविष्य को सुरक्षित रखने का संकल्प है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि यदि आज भूमि को बचाने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए भोजन, पानी और स्वस्थ पर्यावरण सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती बन जाएगा। धरती की हरियाली, उसकी उर्वरता और जीवनदायिनी शक्ति को बनाए रखना हम सबकी जिम्मेदारी है।

--आईएएनएस

पीएसके/वीसी