'MRP और रिटेलर रेट में जमीन-आसमान का फर्क...': सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा- क्या यही सिस्टम चलता रहेगा?
दवाओं की कीमतों में बड़े अंतर को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कड़े सवाल किए हैं। अदालत ने दवाओं की अधिकतम खुदरा कीमत (MRP) और रिटेलर को मिलने वाली कीमत के बीच भारी अंतर पर चिंता जताते हुए पूछा कि आखिर पूरा सिस्टम दवा निर्माताओं के हित में क्यों काम कर रहा है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) की भूमिका पर भी सवाल उठाए और पूछा कि दवाओं की कीमतों पर प्रभावी नियंत्रण क्यों नहीं किया जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब सरकार के सामने दवाओं की कीमतों से जुड़ी ऐसी स्थिति मौजूद है, तो क्या इसे बिना किसी प्रभावी नियंत्रण के जारी रहने दिया जाना चाहिए? अदालत की चिंता का मुख्य कारण दवाओं की वास्तविक लागत, रिटेलर को मिलने वाले मूल्य और पैकेट पर छपी MRP के बीच बड़ा अंतर है। सुनवाई के बाद कोर्ट ने दोनों मामलों में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।
10-20 रुपये की दवा पर 150-200 रुपये की MRP क्यों?
मामले में सामने आए उदाहरणों के मुताबिक, कुछ दवाओं की लागत 10 से 20 रुपये के आसपास होती है और वे रिटेलर को लगभग 30 रुपये में मिलती हैं, जबकि उनकी अधिकतम खुदरा कीमत 150 से 200 रुपये तक छपी होती है। कीमतों के इस अंतर ने दवा मूल्य निर्धारण व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
अदालत यह जानना चाहती है कि दवाओं की कीमतों में इतना बड़ा अंतर क्यों है और मरीजों को उचित कीमत पर दवाएं उपलब्ध कराने के लिए नियामक संस्थाएं क्या कदम उठा रही हैं।
पिछली सुनवाई में भी सरकार से मांगा था जवाब
12 अक्टूबर: कैंसर की दवाओं के ट्रेड मार्जिन पर सवाल
इससे पहले 12 अक्टूबर को हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने एंटी-कैंसर दवाओं के ट्रेड मार्जिन को MRP के 30 प्रतिशत तक सीमित करने के केंद्र सरकार के फैसले पर प्रतिक्रिया दी थी। अदालत ने सरकार के जवाब को पूरी तरह संतोषजनक नहीं माना और सवाल किया कि जब कैंसर की दवाओं पर ट्रेड मार्जिन सीमित किया जा सकता है, तो दूसरी दवाओं के लिए भी ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं बनाई जा सकती।
केंद्र सरकार ने अदालत को बताया था कि एंटी-कैंसर दवाओं पर ट्रेड मार्जिन को MRP के 30 प्रतिशत तक सीमित करने का फैसला लिया गया है। सरकार के अनुसार, इस कदम से मरीजों को सालाना करीब 2,500 करोड़ रुपये की बचत होने की उम्मीद है।
29 सितंबर: कैंसर की दवाओं की कीमतों पर जताई थी नाराजगी
29 सितंबर को हुई सुनवाई में भी सुप्रीम कोर्ट ने कैंसर की दवाओं की ऊंची कीमतों पर कड़ी नाराजगी जताई थी। अदालत ने सवाल किया था कि 2,700 रुपये की दवा की MRP 27,000 रुपये कैसे हो सकती है। दवाओं की कीमतों में इस तरह के अंतर पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने बेहद सख्त शब्दों का इस्तेमाल किया था।
आखिर कैसे तय होती है दवाओं की कीमत? जानिए 4 जरूरी बातें
1. DPCO के तहत जरूरी दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण
ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (DPCO), 2013 के तहत सरकार राष्ट्रीय आवश्यक औषधि सूची (NLEM) में शामिल दवाओं की अधिकतम कीमत निर्धारित करती है। निर्धारित सीमा से अधिक कीमत पर इन दवाओं को बेचना नियमों का उल्लंघन हो सकता है।
2. अधिकतम कीमत तय करने की व्यवस्था
सरकार आवश्यक दवाओं की कीमत तय करने के लिए निर्धारित मूल्य-निर्धारण नियमों और बाजार के आंकड़ों का इस्तेमाल करती है। जिन दवाओं पर मूल्य सीमा लागू होती है, उनके लिए तय अधिकतम कीमत का पालन करना जरूरी है।
3. जरूरी दवाओं की सूची कैसे बनती है?
राष्ट्रीय आवश्यक औषधि सूची में उन दवाओं को शामिल किया जाता है, जो देश की प्रमुख स्वास्थ्य जरूरतों को पूरा करने के लिए महत्वपूर्ण हैं। सूची तैयार करने में बीमारियों के बोझ, दवाओं की उपयोगिता और स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों जैसे पहलुओं को ध्यान में रखा जाता है।
4. सूची की समय-समय पर समीक्षा
आवश्यक दवाओं की सूची की समय-समय पर समीक्षा की जाती है और जरूरत के अनुसार इसमें नई दवाएं शामिल की जा सकती हैं। जो दवाएं मूल्य नियंत्रण के दायरे में नहीं आतीं, उनकी कीमतों पर सरकारी नियंत्रण की व्यवस्था अलग हो सकती है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि ऐसी सभी दवाएं हर तरह के नियामक नियमों से बाहर हैं।
मरीजों को सस्ती दवाएं मिलने की उम्मीद
दवाओं की MRP और उनकी वास्तविक लागत के बीच बड़े अंतर का मुद्दा सीधे आम लोगों की जेब से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट की चिंता है कि दवाओं की कीमतों में पारदर्शिता और प्रभावी नियंत्रण कैसे सुनिश्चित किया जाए, ताकि मरीजों को अनावश्यक आर्थिक बोझ न उठाना पड़े।
अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर नजर रहेगी। अदालत का निर्णय दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण, ट्रेड मार्जिन और दवा मूल्य निर्धारण व्यवस्था को लेकर आगे की दिशा तय करने में अहम हो सकता है।