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सिंधु जल संधि पर भारत का रुख सख्त और स्पष्ट, 'तथाकथित न्यायाधिकरण' के निर्णय को किया खारिज

 

नई दिल्ली, 16 मई (आईएएनएस)। भारत ने सिंधु जल संधि से जुड़े तथाकथित न्यायाधिकरण यानी ‘कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन’ (सीओए) को एक बार फिर अवैध करार देते हुए उसके फैसले को पूरी तरह खारिज कर दिया है। विदेश मंत्रालय ने इसे लेकर शनिवार को एक आधिकारिक बयान जारी किया।

बाद में आधिकारिक प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने एक्स पर कहा कि भारत ने इस तथाकथित मध्यस्थता न्यायालय को कभी कानूनी मान्यता नहीं दी और उसके किसी भी निर्णय, कार्यवाही या आदेश का भारत पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

दरअसल, पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर में भारत की किशनगंगा और रतले पनबिजली परियोजनाओं को लेकर आपत्ति जताते हुए मामले को हेग स्थित मध्यस्थता तंत्र तक पहुंचाया था। जिसे लेकर भारत का लगातार यह कहना रहा है कि संधि के प्रावधानों के तहत इस तरह के ‘कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन’ का गठन ही अवैध है। भारत ने स्पष्ट किया है कि पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय मंच का इस्तेमाल राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किया है।

15 मई 2026 को इस तथाकथित सीओए ने सिंधु जल संधि की व्याख्या और जल भंडारण क्षमता से जुड़े मुद्दों पर एक पूरक फैसला जारी किया, जिसे भारत ने तुरंत खारिज कर दिया। विदेश मंत्रालय ने दो टूक कहा कि भारत की ओर से सिंधु जल संधि को ‘अबयंस’ यानी निलंबित रखने का फैसला अभी भी लागू है।

पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने इस संधि पर विराम लगा दिया था। साफ संकेत दिए थे कि सीमा पार आतंकवाद और जल सहयोग साथ-साथ नहीं चल सकते। अपनी बातों पर रवैया स्पष्ट करते हुए भारत ने संधि के दायित्वों को अस्थायी रूप से रोकने का फैसला लिया था।

भारत का रुख स्पष्ट और सख्त है। ये बताता है कि नई दिल्ली अब पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद और अंतरराष्ट्रीय कानूनी मंचों के दुरुपयोग के खिलाफ अधिक आक्रामक और स्पष्ट नीति अपना रही है। सरकार हर वैश्विक मंच पर दोहराती आई है कि आतंकवाद को लेकर वो सख्त है और किसी भी कीमत पर भारत की संप्रभुता या अखंडता पर प्रहार नहीं सह सकती।

--आईएएनएस

केआर/