शिक्षिका शालिनी कुशवाहा राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार के लिए चयनित, राष्ट्रपति भवन में मिलेगा सम्मान
प्रयागराज, 5 सितंबर (आईएएनएस)। उत्तर प्रदेश के कौशाम्बी की शिक्षिका शालिनी कुशवाहा को राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार के लिए चुना गया है। जल्द ही नई दिल्ली में राष्ट्रपति के हाथों उन्हें देश के सर्वोच्च शिक्षक सम्मान से सम्मानित किया जाएगा।
शालिनी की यह उपलब्धि केवल उनके परिवार के लिए ही नहीं, बल्कि कौशाम्बी और प्रदेश के शिक्षा जगत के लिए भी गर्व का विषय है। एक साधारण शिक्षिका से राष्ट्रपति भवन तक का उनका सफर वर्षों की मेहनत, संघर्ष, लगन और परिवार के सहयोग की कहानी है।
शालिनी कुशवाहा का शिक्षण सफर आसान नहीं रहा। शुरुआत रेवाड़ी से हुई, जहां उन्होंने शिक्षक के रूप में काम करते हुए धीरे-धीरे प्रधानाध्यापक तक की जिम्मेदारी संभाली। इसके बाद उनका स्थानांतरण कौशाम्बी हुआ। यहां सरकारी शिक्षक के रूप में चयन के बाद उन्होंने बच्चों की शिक्षा और स्कूल के शैक्षणिक वातावरण को बेहतर बनाने पर विशेष ध्यान दिया। वर्ष 2015 में उनका सरकारी शिक्षक के रूप में चयन हुआ। इससे पहले और बाद में शिक्षा के क्षेत्र में उनके लगातार बेहतर काम को देखते हुए उन्हें राज्य शिक्षक पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है।
शालिनी ने शिक्षण कार्य को केवल नौकरी तक सीमित नहीं रखा। वह एआरपी (एकेडमिक रिसोर्स पर्सन) के रूप में भी जिम्मेदारी निभा चुकी हैं। इस दौरान उन्होंने विभिन्न स्कूलों की शैक्षणिक स्थिति की निगरानी, निरीक्षण और शिक्षकों के मार्गदर्शन के साथ शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। साथी शिक्षकों की मदद करना और उन्हें बेहतर शिक्षण के लिए प्रेरित करना भी उनके कार्यों का हिस्सा रहा।
शालिनी के पति प्रेम कुमार सिंह ने बताया कि उनकी पत्नी ने परिवार और नौकरी की जिम्मेदारियों के बीच कभी अपने लक्ष्य को पीछे नहीं छोड़ा। रोज स्कूल जाना, लौटकर बच्चों की देखभाल करना और परिवार संभालने के साथ शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ने की कोशिश जारी रखना उनकी दिनचर्या का हिस्सा रहा।
प्रेम कुमार सिंह ने बताया कि वह पहले इलेक्ट्रोलक्स कंपनी में सर्विस करते थे, लेकिन अब परिवार के साथ पूरी तरह समय दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार मिलने की खबर सुनकर पूरा परिवार बेहद खुश है। उनके मुताबिक शालिनी का सपना हमेशा शिक्षा और समाज के लिए बेहतर काम करना रहा है।
शालिनी की बेटी जानवी ने बताया कि उनकी मां के संघर्ष को परिवार ने बहुत करीब से देखा है। उन्होंने कहा कि ऐसा कोई दिन नहीं था जब उनकी मां खाली बैठी हों। बचपन की यादों को साझा करते हुए जानवी ने बताया कि वह और उनकी छोटी बहन उसी स्कूल में पढ़ती थीं, जहां उनकी मां ने शिक्षक के रूप में शुरुआत की थी।
जानवी के मुताबिक उनकी मां रोज उन्हें स्कूटर से स्कूल लेकर जाती थीं। परिवार सुबह करीब चार बजे उठता था। स्कूल की जिम्मेदारी के साथ बच्चों की पढ़ाई और घर संभालने की जिम्मेदारी भी वह पूरी करती थीं। अपनी मेहनत और मददगार स्वभाव के कारण वह अभिभावकों के बीच भी लोकप्रिय हुईं और आगे चलकर वाइस-प्रिंसिपल की जिम्मेदारी संभाली।
वर्ष 2010 में परिवार कौशाम्बी आया। सरकारी शिक्षक बनने के बाद शालिनी ने अपने स्कूल के बच्चों को बेहतर सुविधाएं और कॉन्वेंट स्कूल जैसा शैक्षणिक माहौल देने का लक्ष्य बनाया। उनका प्रयास रहा कि आर्थिक या सामाजिक परिस्थितियां किसी बच्चे की शिक्षा में बाधा न बनें।
जानवी का कहना है कि मां से मिले संस्कारों ने उनके जीवन की दिशा तय की है। वह भविष्य में ब्यूरोक्रेसी में जाना चाहती हैं, ताकि प्रशासनिक सेवा के माध्यम से समाज के लिए सही फैसले ले सकें। उनका कहना है कि जिस तरह उनकी मां ने शिक्षा और समाज की सेवा की, उसी तरह वह भी लोगों के लिए काम करना चाहती है।
--आईएएनएस
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