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शारदीय नवरात्र स्पेशल : कैसे बनती है मां दुर्गा की मूर्ति, जानिए गंगा माटी से लेकर चक्षुदान तक का रहस्य

 

नई दिल्ली, 11 अक्टूबर (आईएएनएस)। शारदीय नवरात्र का पर्व मां दुर्गा की आराधना के लिए बेहद खास माना जाता है। इस दौरान भक्त नौ दिनों तक माता की पूजा-अर्चना करते हैं और अपनी श्रद्धा के अनुसार व्रत रखते हैं। लेकिन, क्या आप जानते हैं कि मां दुर्गा की मूर्ति बनाने की प्रक्रिया बेहद पवित्र, पारंपरिक और कलात्मक होती है। मूर्तिकार कई महीनों की कड़ी मेहनत और खास तरह की मिट्टियों के मिश्रण से इन भव्य प्रतिमाओं को जीवंत रूप देते हैं।

आज के समय में इको-फ्रेंडली (पर्यावरण-अनुकूल) मूर्तियों का चलन बहत तेजी से बढ़ा है, ताकि त्योहार के बाद जलाशयों को प्रदूषण से बचाया जा सके। मां दुर्गा प्रतिमा बनाने के लिए किसी एक मिट्टी का नहीं, बल्कि अलग-अलग गुणों वाली मिट्टियों के मिश्रण का उपयोग किया जाता है, जिसमें गंगा की मिट्टी (कैटल माटी), दोआश माटी, बेलर माटी मुख्य रूप से इस्तेमाल किया जाता है।

दुर्गा पूजा के दौरान कोलकाता के उत्तर में स्थित करीब 300 साल पुरानी पारंपरिक बस्ती, कुम्हारटोली, कला, आस्था और अर्थशास्त्र का केंद्र माना जाता हैं। मूर्तिकला की प्रक्रिया उत्सव से महीनों पहले, आमतौर पर बंगाली वर्ष के अंतिम दिन (चैत्र संक्रांति) से एक विशेष अनुष्ठान के साथ शुरू हो जाती है। सबसे पहले बांस और पुआल से देवी का मूल ढांचा तैयार किया जाता है, जिसे 'काठामो' कहते हैं। इस ढांचे को मजबूती देने के लिए विशेष रूप से सुंदरबन से मंगाए गए पुआल का उपयोग किया जाता है, जिसे जूट की रस्सियों से कसा जाता है।

कुम्हारटोली की मूर्तिकला 'टेराक्रूडा' तकनीक पर आधारित है, जिसका अर्थ है धूप में सुखाई गई बिना पकी कच्ची मिट्टी का उपयोग। ऐतिहासिक रूप से यह पेशा पुरुष-प्रधान रहा है, लेकिन आज चाइना पाल और काकोली पाल जैसी महिला कारीगर इस पारंपरिक ढांचे को तोड़कर अपनी कला का लोहा मनवा रही हैं, जो इस क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण सामाजिक बदलाव का प्रतीक है।

मूर्ति को ठोस आकार देने के लिए मिट्टी का लेपन कई चरणों में किया जाता है। प्रतिमाओं के निर्माण में मुख्य रूप से तीन प्रकार की मिट्टियों का वैज्ञानिक और प्रतीकात्मक उपयोग होता है।

एंटेल माटी एक चिपचिपी और सख्त काली मिट्टी होती है। इसे पानी में घोलकर पुआल के ढांचे पर सबसे पहले लगाया जाता है, ताकि पुआल की दरारें भर सकें और मूर्ति को मजबूत आधार मिले।

गंगा माटी नदी का तल बेहद कोमल और चिकनी मिट्टी होती है। इसका लेप देवी के शरीर को अंतिम रूप देने और त्वचा को कोमलता प्रदान करने के लिए किया जाता है।

मिट्टी सूखने के बाद मूर्तियों को रंगों से सजाया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान देवी की आंखों पर पट्टी बंधी रहती है। 'महालया' के पवित्र दिन, जो पितृ पक्ष के अंत और देवी पक्ष की शुरुआत का प्रतीक है, कारीगर शंख की ध्वनि के बीच देवी की आंखें उकेरते हैं। 'चक्षुदान' कहलाने वाली इस प्रक्रिया के माध्यम से प्रतिमा में प्राणों का संचार माना जाता है।

प्रतिमा के शृंगार में ऐतिहासिक रूप से दो शैलियों का प्रभुत्व रहा है। पहला है 'शोला साज', जो दलदली क्षेत्रों में पाए जाने वाले सफेद जलीय पौधे के कोर से बनाया जाता है और यह पूरी तरह से प्राकृतिक तथा बायोडिग्रेडेबल होता है। दूसरी शैली 'डाक का साज' है, जिसकी शुरुआत औपनिवेशिक काल में हुई थी, जब अमीर जमींदार अपनी मूर्तियों को सजाने के लिए जर्मनी से डाक द्वारा विशेष चांदी के वर्क और धागे मंगवाते थे।

आस्था के इस महापर्व के साथ जल प्रदूषण की एक गंभीर चुनौती भी जुड़ी रही है। विसर्जन के बाद नदियों में घुलने वाले प्लास्टर ऑफ पेरिस (पीओपी) और भारी धातुओं (जैसे सीसा और पारा) युक्त सिंथेटिक रंगों ने गंगा, यमुना और अन्य जलीय पारिस्थितिक तंत्रों को भारी नुकसान पहुंचाया है।

इस संकट के समाधान के लिए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने सख्त पर्यावरण-अनुकूल दिशा-निर्देश लागू किए हैं। मूर्तिकला में अब कई तरह के बदलाव स्पष्ट रूप से देखे जा रहे हैं।

प्लास्टर ऑफ पेरिस (पीओपी) प्राकृतिक चिकनी मिट्टी (शादू माटी) और पेपर-मैशे पीओपी पानी में अघुलनशील है, जबकि प्राकृतिक मिट्टी आसानी से पानी में घुलकर जलीय जीवन को नुकसान नहीं पहुंचाती।

पहले मूर्तियों को रंगने के लिए सिंथेटिक और सीसा (लेड) वाले रंगों का इस्तेमाल होता था, जो पानी के लिए बहुत हानिकारक होते हैं। अब इनकी जगह प्राकृतिक, पानी में आसानी से घुलने वाले और पौधों से बने रंगों का उपयोग किया जा रहा है। इससे जहरीले रसायन पानी में नहीं घुलते और जलीय जीवों और खाद्य श्रृंखला को प्रदूषण से बचाया जा सकता है।

कृत्रिम रासायनिक पाउडर रंगों को मूर्ति पर टिकाए रखने के लिए इमली के बीजों से बने प्राकृतिक, 100 प्रतिशत बायोडिग्रेडेबल बाइंडर का प्रयोग किया जा रहा है।

इसके अतिरिक्त, प्राकृतिक जलस्रोतों को बचाने के लिए अब कृत्रिम तालाबों और विशेष कुंडों का निर्माण किया जा रहा है। कोलकाता नगर निगम जैसे निकायों ने ऐसे घाट बनाए हैं जहां मूर्तियों को शक्तिशाली 'वाटर जेट' से गलाया जाता है।

इस प्रक्रिया में उत्पन्न कचरे और फूलों (निर्माल्या) को खाद बनाने के लिए अलग कर लिया जाता है और पानी को सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) में भेज दिया जाता है। फाइबरग्लास से बनी पुन: प्रयोज्य मूर्तियों का चलन भी विदेशों में निर्यात और प्रदूषण कम करने के उद्देश्य से बढ़ रहा है।

वर्ष 2021 में, यूनेस्को कोलकाता की दुर्गा पूजा को 'मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत' की प्रतिष्ठित सूची में शामिल किया।

--आईएएनएस

वीकेयू/एएस