सत्य निकेतन मामले में वकील ऋषभ सिंह ने एमसीडी के ऑडिट पर उठाए सवाल
नई दिल्ली, 25 सितंबर (आईएएनएस)। दिल्ली के सत्य निकेतन में अवैध निर्माण को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने जवाब दाखिल करने के लिए 10 दिन का समय दिया है। मामले के वकील ऋषभ सिंह ने एमसीडी के हलफनामे को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं कि बिना नोटिस के सर्टिफिकेशन कैसे हो रहा है?
सत्य निकेतन मामले के वकील ऋषभ सिंह ने कहा, "हमें सत्य निकेतन में जवाब दाखिल करने का समय मिला। कोर्ट ने हमें एमसीडी और अन्य प्रतिवादियों को जवाब दाखिल करने के लिए 10 दिन का समय दिया। अगर मैं जवाब पर संक्षिप्त जानकारी दूं, तो अवैध अतिक्रमण और अवैध निर्माण के मुद्दे को उजागर किया गया है।
उन्होंने आगे कहा कि जवाब में, एमसीडी ने उनके अनुसार सभी पीजी का ऑडिट किया है। लेकिन साथ ही, यदि आप एफिडेविट को गहराई से पढ़ते हैं, तो आप देख सकते हैं कि उन्होंने विशेष रूप से उल्लेख किया है कि उन्होंने कुछ इमारतों के मालिकों को डीटीयू और आईआईटी के विशेषज्ञों के पास भेजा है ताकि उनसे उनका ऑडिट करवाया जा सके। लेकिन उन्होंने इसके साथ नोटिस नहीं लगाया है। यही मुख्य मुद्दा है। वे कौन से विशेषज्ञ हैं जो इन इमारतों को प्रमाणित करने वाले हैं? और एमसीडी का सबसे पहला कर्तव्य इन सभी चीजों को देखना है।
वकील ऋषभ सिंह ने कहा कि उन्होंने पीजी के इन मालिकों से रूपांतरण (कनवर्जन) की राशि ली है, लेकिन उन्होंने यह नहीं देखा कि वे इन परिस्थितियों का पालन कर रहे हैं या नहीं। चाहे वे वहां बने निर्माण का पालन कर रहे हों या नहीं। और उन्होंने बिल्डिंग गिरने की तस्वीरें भी शामिल की हैं। लेकिन उन्होंने मुखर्जी नगर क्षेत्र से केवल एक तस्वीर लगाई है, और मैं व्यक्तिगत रूप से वहां गया हूं और मैंने देखा है कि छात्र इस भीड़भाड़ वाले इलाके में कैसे रह रहे हैं।
उन्होंने कहा कि मुझे नहीं पता कि उन्होंने वहां किसी अन्य इमारत को क्यों नहीं गिराया है। तो ये मुख्य मुद्दे हैं और निश्चित रूप से हम इस विशेष रिट में अपना जवाब दाखिल करेंगे और हम यह भी सुझाव देंगे कि क्या परिणाम हैं और क्या सुधार हैं जो एमसीडी कर सकती है। हमारी सबसे पहली अपील यह है कि निर्माण स्थलों के इन ऑडिट में शामिल अधिकारियों की एक निश्चित जिम्मेदारी होनी चाहिए।
वकील ऋषभ सिंह ने आगे बताया कि मूल रूप से, एसजी तुषार मेहता ने इसका विरोध किया। लेकिन अंततः, अदालत ने वह आवेदन खारिज कर दिया। उन्हें अपने सुझाव दाखिल करने का निर्देश दिया गया है। यदि उनके पास अतिक्रमण की इस विशेष स्थिति के बारे में कोई सुझाव है, तो वे इसके लिए तैयार हैं। तो हम विशेष रूप से एमसीडी अधिकारियों के एफिडेविट का जवाब दाखिल करेंगे।
उन्होंने कहा कि दिल्ली विश्वविद्यालय ने अपना एफिडेविट दायर किया है, और वे कह रहे हैं कि हमारे पास उपलब्ध छात्रावास सुविधाओं की यह संख्या है, लेकिन बड़ी संख्या में छात्र पूरे देश से यहां पढ़ने आ रहे हैं, और वे अपनी जान जोखिम में डाल रहे हैं। इसके बावजूद यह उजागर करना है कि यह मेरा मौलिक अधिकार है, इस राष्ट्र के नागरिक के रूप में यह मेरा मौलिक अधिकार है कि मेरे चारों ओर एक सुरक्षित ढांचा हो और इसे सुप्रीम कोर्ट ने भी माना है। तो आगे देखेंगे कि इसका क्या परिणाम आता है।
--आईएएनएस
केके/एमएस