सताधार के पवित्र स्थल पर आत्मनिर्भरता की आरती : रोजाना 10 हजार श्रद्धालुओं का भोजन बायोगैस पर होता है तैयार
गांधीनगर, 29 मार्च (आईएएनएस)। गुजरात के जूनागढ़ जिले में स्थित प्रसिद्ध यात्राधाम संत आपा गीगा का स्थान सताधार धाम अपने संध्या आरती दर्शन के लिए विख्यात है। आपा गीगा का यह ‘पवित्र स्थल’ अब वैकल्पिक ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का प्रतीक बन गया है। सताधार स्थान संध्या आरती की पवित्र ज्वाला के साथ-साथ आत्मनिर्भरता की ज्वाला भी प्रज्वलित कर रहा है।
सताधार धाम में गुजरात का सबसे अधिक क्षमता वाला बायोगैस संयंत्र कार्यरत है। वर्तमान में यहां दैनिक 85 घनमीटर की क्षमता वाले चार बायोगैस संयंत्र चालू हैं और दो अन्य (दैनिक 85 घनमीटर) नए बायोगैस संयंत्र स्थापित करने की प्रक्रिया जारी है।
सताधार स्थान में एक हजार गायें हैं। उल्लेखनीय बात यह है कि यहां श्रद्धालुओं के लिए एक विशाल अन्नक्षेत्र चलाया जाता है, जहां रोजाना औसतन 10,000 लोगों को सात्विक भोजन-प्रसाद मिलता है। इस रसोई को चलाने के लिए केवल बायोगैस का उपयोग किया जाता है। बायोगैस उत्पन्न करने के लिए रोजाना 8 हजार किलो गोबर का उपयोग होता है।
संस्था के प्रबंधकों ने बताया कि जब बायोगैस की व्यवस्था नहीं थी, तब रसोई बनाने के लिए लकड़ी के चूल्हे का उपयोग किया जाता था, जिसके लिए रोजाना 800 से 900 किलो लकड़ी का इस्तेमाल होता था। वहीं, जब रसोई के लिए सिलेंडर का इस्तेमाल होता था, तब रोजाना औसतन 10 से 15 सिलेंडर की खपत होती थी।
सताधार के महंत विजयबापू ने बताया, “हम यहां खाना पकाने के मामले में पूरी तरह से आत्मनिर्भर हैं और रसोई बनाने के लिए केवल बायोगैस का ही उपयोग करते हैं। इसके अलावा, बायोगैस संयंत्र से निकलने वाली स्लरी का उपयोग संस्था की कृषि गतिविधियों में जैविक खाद के रूप में किया जाता है।”
गुजरात सरकार के गुजरात ऊर्जा विकास निगम (जीईडीए) द्वारा ‘संस्थागत बायोगैस प्लांट योजना’ के अंतर्गत संस्थाओं को बायोगैस संयंत्र स्थापित करने के लिए सब्सिडी दी जाती है। सताधार धाम को भी इस सहायता का लाभ मिला है।
गुजरात में स्थित गौशालाओं, पिंजरापोलों, शैक्षणिक संस्थानों और चैरिटेबल ट्रस्टों के पास बड़े पैमाने पर पशुधन के साथ ही कृषि अवशेष और रसोई का कचरा उपलब्ध होता है। इन सभी जैविक पदार्थों को ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में (एनेरोबिक प्रक्रिया के माध्यम से) बायोगैस में परिवर्तित किया जाता है, जो खाना पकाने के लिए एक किफायती ईंधन प्रदान करता है। साथ ही, इस प्रक्रिया के बाद मिलने वाला उप-उत्पाद स्लरी उत्तम नाइट्रोजन युक्त जैविक खाद के रूप में कृषि में उपयोगी सिद्ध होता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दूरदर्शिता और मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के नेतृत्व में गुजरात वैकल्पिक ऊर्जा के उपयोग के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन रहा है। राज्य में वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को प्रोत्साहन देने तथा गौशाला, पिंजरापोलों, शैक्षणिक एवं अन्य संस्थानों में उत्पन्न होने वाले जैविक कचरे का वैज्ञानिक तरीके से सदुपयोग करने के लिए राज्य सरकार द्वारा संस्थागत बायोगैस संयंत्र की स्थापना की विशेष योजना लागू की गई है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य संस्थाओं को ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर बनाना, पर्यावरण प्रदूषण को कम करना और टिकाऊ विकास को बढ़ावा देना है।
इस योजना के अंतर्गत 25, 35, 45, 60 और 85 घनमीटर क्षमता वाले संयंत्र के लिए सहायता दी जाती है। राज्य सरकार गैर-लाभकारी संस्थानों को 50 फीसदी तक की सहायता देती है, ताकि अधिक से अधिक संस्थाएं स्वच्छ ऊर्जा और जैविक कृषि की दिशा में आगे बढ़ सकें।
राज्य सरकार ने वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए संस्थागत बायोगैस योजना के तहत कुल 12 करोड़ रुपए का प्रावधान किया है, जिनमें से लगभग 60 संस्थागत बायोगैस संयंत्र स्थापित करने की प्रक्रिया जारी है। इस योजना के कार्यान्वयन के लिए वर्ष 2025-26 के दौरान कुल 15 एजेंसियों को सूचीबद्ध किया गया है। इस योजना के तहत वर्ष 2021-22 से 2025-26 के दौरान, पिछले पांच वर्षों में कुल 193 संस्थाओं में बायोगैस संयंत्र स्थापित किए गए हैं, जिनकी कुल क्षमता दैनिक 13,955 घनमीटर है। आगामी वर्ष 2026-27 के लिए भी संस्थागत बायोगैस योजना के अंतर्गत कुल 12 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है, जिसके तहत 60 बायोगैस संयंत्र स्थापित करने की योजना है।
--आईएएनएस
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